" डॉ. एस. एन. सुब्बाराव ‘भाई जी’: जिनकी साधना थी युवा निर्माण, जिनका मार्ग था अहिंसा और जिनका सपना था विश्व शांति*"
27 अक्टूबर 2026 | पाँचवीं पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि। क्या किसी एक व्यक्ति का जीवन हजारों युवाओं की दिशा बदल सकता है? क्या प्रेम और अहिंसा के माध्यम से हिंसा से प्रभावित समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है? क्या राष्ट्रीयता की भावना को मानवता और विश्व बंधुत्व से जोड़कर एक बेहतर दुनिया का निर्माण किया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर हमें उस महापुरुष के जीवन में मिलता है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वे थे—पद्मश्री से सम्मानित महान गांधीवादी समाजसेवी डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी, जिन्हें पूरा देश प्यार और सम्मान से ‘भाई जी’ कहता था।
आज 27 अक्टूबर 2026 को उनकी पाँच वीं पुण्यतिथि पर हम उन्हें केवल स्मरण नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन विचारों को भी समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिनकी आज के समाज और विश्व को पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। भाई जी का जीवन हमें सिखाता है कि मनुष्य की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने अपने लिए कितना अर्जित किया, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसने दूसरों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन लाया।
1. एक ऐसा जीवन, जिसकी शुरुआत ही देशसेवा से हुई
डॉ. सेलम नंजुंडैया सुब्बाराव जी का जन्म 7 फरवरी 1929 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ था। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने बहुत कम उम्र में ही देशसेवा का मार्ग अपना लिया था। वर्ष 1942 में, मात्र 13 वर्ष की आयु में, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में शामिल हुए। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी किया था। जिस उम्र में सामान्यतः बच्चे अपने भविष्य के सपने देखना शुरू करते हैं, उस उम्र में भाई जी ने अपने जीवन को देश और समाज के लिए उपयोगी बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए थे। आगे चलकर उन्होंने अपना जीवन रचनात्मक कार्यों, युवा शिविरों और सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों के लिए समर्पित कर दिया। उनके लिए देशभक्ति केवल नारा नहीं थी। वह उनके व्यवहार, विचारों और जीवनशैली में दिखाई देती थी। उनका जीवन आज के युवाओं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछता है— हम अपने जीवन में केवल सफल होने का प्रयास कर रहे हैं, या दूसरों के लिए उपयोगी बनने का भी?
2. भाई जी: एक नाम नहीं, आत्मीयता की एक अनुभूति
डॉ. सुब्बाराव जी को लोग ‘भाई जी’ क्यों कहते थे? इसका उत्तर उनके व्यक्तित्व की सरलता, आत्मीयता और सहज व्यवहार में छिपा है। वे युवाओं से औपचारिक दूरी बनाकर नहीं रहते थे। वे उनके साथ बैठते, गीत गाते, श्रमदान करते, संवाद करते और उन्हें अपनेपन का अनुभव कराते थे। उनकी विशेषता थी कि वे युवाओं को केवल उपदेश नहीं देते थे, बल्कि अपने आचरण से प्रेरित करते थे। वे विभिन्न भाषाओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोगों से संवाद स्थापित करने में सक्षम थे। उनके लिए भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र की विविधताएँ लोगों को अलग करने वाली दीवारें नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने के अवसर थीं। उनकी आत्मीयता ने अनेक युवाओं को समाजसेवा की ओर प्रेरित किया। आज जब व्यक्तिगत सफलता की दौड़ में मानवीय संबंधों, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी पर चर्चा करना आवश्यक हो गया है, तब भाई जी का व्यक्तित्व हमें याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व लोगों पर प्रभाव जमाने में नहीं, बल्कि उनके भीतर बेहतर बनने की प्रेरणा जगाने में है।
3. युवाओं का व्यक्तित्व निर्माण: जीवनभर चलने वाला मिशन
भाई जी के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष था—युवा शक्ति को सकारात्मक दिशा देना। वे समझते थे कि युवा किसी भी राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण शक्ति हैं। लेकिन इस शक्ति का वास्तविक उपयोग तभी संभव है, जब उसमें अनुशासन, आत्मविश्वास, सहयोग, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में युवा शिविरों और श्रम शिविरों का आयोजन किया। इन शिविरों में युवा अलग-अलग राज्यों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आकर एक साथ रहते थे। वे श्रमदान करते, सामूहिक गतिविधियों में भाग लेते, एक-दूसरे की भाषाएँ और संस्कृतियाँ समझते तथा समाज की समस्याओं से परिचित होते थे। यहाँ व्यक्तित्व विकास का अर्थ केवल प्रभावशाली वक्ता बनना या नेतृत्व की तकनीक सीखना नहीं था। इसका अर्थ था—
- अपने भीतर आत्मविश्वास और अनुशासन विकसित करना।
- दूसरों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता रखना।
- श्रम की गरिमा को समझना।
- सामूहिक जिम्मेदारी निभाना।
- विविधताओं के बीच सहयोग करना।
- अपने ज्ञान और क्षमताओं का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना।
भाई जी की दृष्टि में युवा निर्माण और राष्ट्र निर्माण एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उनका कार्य हमें बताता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील मनुष्य बनना भी है।
4. चंबल की धरती पर शांति का ऐतिहासिक प्रयोग
डॉ. सुब्बाराव जी के जीवन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय चंबल घाटी में बागियों के आत्मसमर्पण और उनके पुनर्वास से जुड़ा है। एक समय चंबल घाटी डकैती और हिंसा के कारण जानी जाती थी। वहाँ अनेक परिवार भय और असुरक्षा के वातावरण में जीवन बिताते थे। भाई जी ने इस चुनौती को केवल दंड और भय के दृष्टिकोण से नहीं देखा। उन्होंने शांति, संवाद, सामाजिक सहभागिता और पुनर्वास की संभावनाओं पर भी काम किया। चंबल क्षेत्र में युवा शिविरों और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने स्थानीय समाज से संबंध स्थापित किए।मुरैना जिले के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम ने इस प्रयास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।भाई जी और अन्य गांधीवादी शांति कार्यकर्ताओं के प्रयासों से चंबल के 600 से अधिक बागियों के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को बल मिला। कुछ विवरणों में यह संख्या लगभग 654 बताई गई है।14 अप्रैल 1972 को जौरा में आयोजित ऐतिहासिक आत्मसमर्पण कार्यक्रम में जयप्रकाश नारायण भी उपस्थित थे।इस परिवर्तन में विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण और अन्य शांति कार्यकर्ताओं के प्रयासों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था।यह घटना केवल आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं थी। आत्मसमर्पण करने वालों के परिवारों, हिंसा से प्रभावित लोगों और उनके पुनर्वास से जुड़ी चुनौतियों पर भी काम किया गया।इस ऐतिहासिक प्रयास का सबसे बड़ा संदेश यह था कि समाज की जटिल समस्याओं के समाधान के लिए मानवीय संवेदना, धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।चंबल की कहानी हमें बताती है कि शांति केवल हिंसा का अभाव नहीं है; शांति का अर्थ है लोगों को सम्मानजनक और रचनात्मक जीवन की ओर लौटने के अवसर उपलब्ध कराना।
5. राष्ट्रीय युवा परियोजना: भारत की विविधता को एक परिवार में बदलने का प्रयास
वर्ष 1971 में भाई जी ने राष्ट्रीय युवा परियोजना (National Youth Project) की स्थापना की। इस पहल का उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, शांति और रचनात्मक कार्यों से जोड़ना था।भाई जी की कल्पना का भारत ऐसा था, जहाँ विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले, अलग-अलग धर्मों को मानने वाले और विविध सांस्कृतिक परंपराओं से आने वाले युवा एक साथ बैठ सकें, भोजन कर सकें, श्रमदान कर सकें और एक-दूसरे को समझ सकें।उनका विश्वास था कि राष्ट्रीय एकता केवल भाषणों से नहीं आती। इसके लिए लोगों को एक-दूसरे के साथ रहने और मिलकर काम करने का अवसर देना आवश्यक है।राष्ट्रीय युवा परियोजना के माध्यम से आयोजित शिविरों ने अनेक युवाओं को इस अनुभव से जोड़ा।भाई जी का संदेश था कि विविधता का सम्मान करते हुए एकता का निर्माण किया जा सकता है।आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मतभेद तनाव का कारण बनते हैं, तब उनकी कार्यपद्धति एक महत्त्वपूर्ण सीख देती है—लोगों को जोड़ने के लिए केवल समानताओं को खोजना पर्याप्त नहीं; एक-दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना भी सीखना होगा।
6. सद्भावना रेल यात्रा: भारत को जोड़ने वाली एक प्रेरक पहल
भाई जी ने राष्ट्रीय एकता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सद्भावना रेल यात्रा जैसी महत्त्वपूर्ण पहल का नेतृत्व किया। 1993–94 की इस यात्रा में देश के विभिन्न हिस्सों से आए 2,500 से अधिक युवाओं ने भाग लिया। यात्रा के दौरान 26 राज्यों के युवाओं ने विभिन्न भाषाओं, धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने के बावजूद साथ रहकर सद्भावना का संदेश दिया।कल्पना कीजिए—अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले युवा, जिनकी जीवनशैली और परंपराएँ भिन्न हैं, लंबे समय तक एक परिवार की तरह साथ रहते हैं।यह अपने आप में सामाजिक शिक्षा का एक अनूठा प्रयोग था।इस यात्रा का संदेश था कि भारत को समझने के लिए केवल उसका भूगोल जानना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझने के लिए उसके लोगों, उनकी संस्कृति, उनकी संवेदनाओं और उनके संघर्षों को भी जानना आवश्यक है।भाई जी की दृष्टि भारत तक सीमित नहीं थी। वे प्रेम, शांति और मानवता के संदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में विश्वास रखते थे।उनके युवा शिविरों और कार्यक्रमों ने विदेशों में भी लोगों को जोड़ा।इस प्रकार उनकी कार्यशैली स्थानीय समस्याओं के समाधान से लेकर वैश्विक सद्भावना तक फैली हुई थी।
7. गीत, संगीत और सरलता: दिलों को जोड़ने की अनूठी कला
भाई जी केवल सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं थे, बल्कि युवाओं के बीच अपनी गीत-संगीत की शैली के कारण भी लोकप्रिय थे।वे सामूहिक गायन के माध्यम से युवाओं में ऊर्जा, उत्साह और एकता की भावना जगाते थे।उनके कार्यक्रमों में गीत केवल मनोरंजन नहीं थे। वे संवाद, सहभागिता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बन जाते थे।विभिन्न भाषाओं के गीतों और सामूहिक गतिविधियों से युवा एक-दूसरे की संस्कृति को समझते और अपनापन अनुभव करते थे।उनकी कार्यशैली हमें सिखाती है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए केवल गंभीर भाषणों की आवश्यकता नहीं होती। कला, संगीत, मित्रता और साझा अनुभव भी लोगों को जोड़ने की असाधारण शक्ति रखते हैं।आज की डिजिटल दुनिया में, जहाँ संदेश कुछ ही क्षणों में सीमाओं के पार पहुँच जाते हैं, भाई जी की यह सीख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।यदि डिजिटल माध्यमों का उपयोग विभाजन के बजाय संवाद, नफरत के बजाय सद्भाव और निराशा के बजाय प्रेरणा फैलाने के लिए किया जाए, तो वे मानवता की बड़ी सेवा कर सकते हैं।
8. सम्मान अनेक मिले, लेकिन साधना का केंद्र सेवा रहा
डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी को उनके सामाजिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए।उनके प्रमुख सम्मानों में पद्मश्री, राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार, राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार और रचनात्मक कार्यों के लिए जमनालाल बजाज पुरस्कार शामिल हैं।इन सम्मानों ने उनके सामाजिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।लेकिन उनके जीवन का मूल्यांकन केवल पुरस्कारों की संख्या से नहीं किया जा सकता।उनकी वास्तविक विरासत उन युवाओं में दिखाई देती है, जिन्होंने सेवा को अपने जीवन का हिस्सा बनाया; उन सामाजिक कार्यकर्ताओं में दिखाई देती है, जिन्होंने राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के लिए काम किया; और उन लोगों में दिखाई देती है, जिन्होंने उनके प्रयासों से प्रेरणा लेकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा।भाई जी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सम्मान प्राप्त करना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन समाज के लिए उपयोगी बने रहना एक निरंतर साधना है।
9. वैश्विक समाज के लिए भाई जी के विचार क्यों प्रासंगिक हैं?
आज दुनिया अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है।युवाओं में अकेलेपन और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंताएँ हैं। अनेक समाजों में धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेद तनाव पैदा करते हैं। हिंसा, भेदभाव और सामाजिक असमानता के प्रश्न भी हमारे सामने हैं।इन परिस्थितियों में भाई जी के जीवन से निकले कुछ विचार विशेष रूप से उपयोगी हैं।पहला—युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान की शक्ति भी हैं।उन्हें निर्णय लेने, समाजसेवा करने और सकारात्मक परिवर्तन लाने के अवसर मिलने चाहिए।दूसरा—शांति का निर्माण संवाद से होता है।मतभेदों को समझने, सुनने और सम्मानजनक बातचीत के माध्यम से सुलझाने की संस्कृति विकसित करना आवश्यक है।तीसरा—व्यक्तित्व विकास का सामाजिक उद्देश्य भी होना चाहिए।आत्मविश्वास और नेतृत्व की क्षमताएँ तभी व्यापक अर्थ प्राप्त करती हैं, जब उनका उपयोग दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में किया जाए।चौथा—विविधता को सम्मान देना वैश्विक नागरिकता का आधार है।दुनिया के अलग-अलग समाजों को एक-दूसरे की संस्कृति और परिस्थितियों को समझने के अवसर देने चाहिए।पाँचवाँ—बदलाव की शुरुआत अपने व्यवहार से होती है।यदि हम अपने परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल और समुदाय में सम्मान, सहयोग और संवेदनशीलता का वातावरण बनाते हैं, तो बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रख सकते हैं।भाई जी का जीवन किसी एक देश या समुदाय के लिए ही प्रेरणादायक नहीं है। उनके कार्यों में ऐसे सार्वभौमिक मूल्य दिखाई देते हैं, जिन्हें अलग-अलग संस्कृतियों और समाजों के लोग अपने संदर्भ में समझ सकते हैं।प्रेम, अहिंसा, सामाजिक न्याय, युवा सहभागिता और मानव गरिमा—ये किसी एक भूगोल तक सीमित विचार नहीं हैं।
10. पाँचवीं पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी?
27 अक्टूबर 2021 को डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी का निधन हुआ था। आज उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि पर हम उनके जीवन और योगदान को याद करते हुए स्वयं से कुछ प्रश्न पूछ सकते हैं।क्या हम अपने आसपास के युवाओं को सकारात्मक दिशा देने के लिए कुछ कर रहे हैं?क्या हम समाज में व्याप्त भेदभाव और मतभेदों को कम करने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं?क्या हम अपने बच्चों और युवाओं को केवल सफल होने की शिक्षा दे रहे हैं, या संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने के संस्कार भी दे रहे हैं?क्या हम सोशल मीडिया का उपयोग केवल अपनी पहचान बनाने के लिए कर रहे हैं, या सकारात्मक विचारों और प्रेरणादायक जीवन-कथाओं को फैलाने के लिए भी?इन प्रश्नों के उत्तर ही भाई जी के जीवन से मिलने वाली प्रेरणा को व्यवहार में बदल सकते हैं।उनकी स्मृति को जीवित रखने का अर्थ केवल समारोह आयोजित करना नहीं है। इसका अर्थ है—उनके विचारों से प्रेरणा लेकर समाज के लिए कुछ उपयोगी करने का संकल्प लेना।एक युवा यदि किसी जरूरतमंद की सहायता करता है, विभिन्न समुदायों के बीच मित्रता बढ़ाने का प्रयास करता है, श्रम की गरिमा को समझता है या समाज की किसी समस्या के समाधान में योगदान देता है, तो वह भी सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक कदम बढ़ाता है।
11. भाई जी की विरासत: एक बेहतर दुनिया का सपना
डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी का जीवन हमें एक ऐसे समाज की कल्पना करने के लिए प्रेरित करता है, जहाँ युवा अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा दें; जहाँ मतभेद संवाद से सुलझाए जाएँ; जहाँ विविधताओं का सम्मान हो; और जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान उसके धर्म, भाषा या क्षेत्र से पहले उसकी मानवीय गरिमा के आधार पर की जाए।यह सपना केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।आज आवश्यकता है कि भाई जी की जीवन-कथा को विद्यालयों, महाविद्यालयों, युवा शिविरों, सामाजिक संगठनों और डिजिटल माध्यमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।उनके कार्यों का अध्ययन हो, उनके अनुभवों से सीख ली जाए और युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण तथा शांति स्थापना के नए प्रयास किए जाएँ।क्योंकि महापुरुषों की विरासत केवल इतिहास की पुस्तकों में सुरक्षित रखने के लिए नहीं होती। वह वर्तमान को दिशा देने और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए होती है।
अंतिम शब्द: एक श्रद्धांजलि, एक संकल्प
आज 27 अक्टूबर 2026 को डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी की पाँचवीं पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आइए, हम उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प करें।आइए, हम ऐसी युवा पीढ़ी के निर्माण में योगदान दें, जो आत्मविश्वासी होने के साथ संवेदनशील भी हो; जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे; और जो व्यक्तिगत सफलता के साथ समाज की भलाई को भी महत्त्व दे।आइए, हम प्रेम, शांति, सद्भावना और अहिंसा के उन मूल्यों को अपने व्यवहार में स्थान दें, जिन्हें भाई जी ने अपने जीवन से महत्त्वपूर्ण बनाया।किसी महापुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनके जाने के बाद भी उनके विचार हमारे कर्मों में जीवित रहें।डॉ. एस. एन. सुब्बाराव जी का जीवन हमें यही प्रेरणा देता है—अपने लिए जिएँ, लेकिन केवल अपने लिए नहीं; अपनी सफलता के साथ समाज की उन्नति का भी सपना देखें।
भाई जी को विनम्र नमन!
आपका जीवन सेवा की प्रेरणा है।
आपके विचार शांति का संदेश हैं।
और आपकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर है।
जितेन्द्र ब्रह्मभट्ट, लेखक

