वनस्पति तेलों से बना पहला साबुन
बंगाल विभाजन के विरोध में उपजे स्वदेशी आंदोलन के वक्त भारतीयों ने ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार करना शुरू किया। तब उद्यमी अर्देशिर गोदरेज ने देशवासियों के लिए स्वदेशी और स्वावलंबी उत्पाद बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने और उनके भाई पिपरोश ने मिलकर गोदरेज कंपनी की नींव रखी। दुनिया का ऐसा पहला साबुन पेश किया जो एनिमल फैट यानी पशु चर्बी के बजाय पूरी तरह वनस्पति तेलों से तैयार किया गया था। 'अहिंसा' और 'स्वदेशी' के इस अनूठे मेल ने बाजार में धूम मचा दी। आगे चलकर 'वतनी' (जिसका अर्थ 'वतन से' है) इसी परंपरा का सबसे लोकप्रिय प्रतीक बनकर उभरा।
जनता की पहली पसंद बना
1920 के दशक के अंत या 1930 के दशक की शुरुआत में वतनी लॉन्च हुआ था। यह साबुन अपनी बेहतरीन क्वालिटी और कम कीमत (मात्र तीन आना प्रति बट्टी) के कारण आम जनता की पहली पसंद बन गया था। इसे बढ़ावा देने के लिए हरे और सफेद रंग के रैपर पर 'मेड इन इंडिया, फॉर इंडियंस, बाय इंडियंस' लिखा गया। सबसे खास बात यह थी कि देश के विभाजन और स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद तक भी इस साबुन के रैपर पर अखंड भारत का नक्शा छपा रहता था। यह इसके ऐतिहासिक और भावनात्मक जुड़ाव को गहराई से दिखाता है।
मधुबाला बनीं ब्रांड का चेहरा
1950 के दशक के शुरुआती सालों में उस दौर की मशहूर अभिनेत्री मधुबाला इस ब्रांड का चेहरा बनीं। उन्होंने इसके प्रचार-प्रसार में चार चांद लगा दिए। माथे पर सटीक बिंदी, बालों की खूबसूरत चोटी, कानों में सुनहरे झुमके और एक एलिगेंट साड़ी पहने मधुबाला 'मुगल-ए-आजम' की अनारकली की तरह इस विज्ञापन में नजर आईं। ब्रांड की लोकप्रिय पंचलाइन थी- 'इट्स सुपीरियर, इट्स स्वदेशी।' इस विज्ञापन ने ग्राहकों को सामुदायिक हित में स्वदेशी अपनाने के लिए गहराई से प्रभावित किया।
यादों में अमर हो गया साबुन
पारदर्शिता और कम लागत में बेहतरीन क्वालिटी देने के गोदरेज बंधु के विजन ने इस ब्रांड को अमर बना दिया। वैसे तो समय के साथ साबुन के निर्माण में तकनीकी सुधार हुए। साथ ही 1952 में इसी प्रक्रिया और शोध से 'सिंथॉल' जैसे आधुनिक और लोकप्रिय ब्रांड का जन्म हुआ। लेकिन, 'वतनी' और मधुबाला के विज्ञापनों से जुड़ी वे पुरानी यादें आज भी भारतीय विज्ञापन जगत और स्वतंत्रता काल के स्वर्णिम इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं।



