हकीम का काढ़ा बन गया शरबत जो भारत-पाकिस्तान के लोगों की रूह में उतर गया, जूही चावला की ऐसे हुई एंट्री

हकीम का काढ़ा बन गया शरबत जो भारत-पाकिस्तान के लोगों की रूह में उतर गया, जूही चावला की ऐसे हुई एंट्री
नई दिल्‍ली: रूह अफजा। यह सिर्फ एक लाल शरबत नहीं है। इसके बजाय भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के करोड़ों लोगों की यादों का पिटारा है। साल 1906 में पुरानी दिल्ली की गलियों से यूनानी हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने लू और भीषण गर्मी से बचाने वाली दवा के तौर पर इसकी शुरुआत की थी। 120 साल बाद भी यह अपने अनूठे स्वाद के साथ दिलों पर राज कर रहा है। इस ब्रांड के सफर में बॉलीवुड अभिनेत्री जूही चावला की तब एंट्री हुई जब 2008 में उन्‍हें इसका ब्रांड एंबेसडर बनाया गया। आइए, यहां रूह अफजा की पूरी कहानी के बारे में जानते हैं।

ठंडा काढ़ा ऐसे बना शरबत

रूह अफजा का जन्म 1906 में पुरानी दिल्ली की भीषण गर्मी और लू से निपटने के लिए हुआ था। हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने संतरा, तरबूज, अनानास, गुलाब, केवड़ा, धनिया, खस-खस और कमल के अर्क जैसी दर्जनों प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, फलों-फूलों को मिलाकर एक ठंडा काढ़ा तैयार किया। इसका नाम पंडित दयाशंकर नसीम की किताब 'मसनवी गुलजार-ए-नसीम' के एक पात्र से प्रेरित होकर 'रूह अफजा' (आत्मा को ताजगी देने वाला) रखा गया। इस शरबत की खुशबू और स्वाद इतना मुग्ध करने वाला था कि पहली बार बनते ही कुछ घंटों में पूरी कड़ाही खाली हो गई। 1910 में मिर्जा नूर अहमद ने इसका लाल-हरा-पीला आकर्षक लेबल डिजाइन किया। इसे बॉम्बे (मुंबई) के प्रसिद्ध पारसी बॉल्टन प्रेस में छपवाया गया। कांच की पांच छल्लेदार बोतलों और हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू में लिखे लेबल के साथ यह ब्रांड जल्द ही घर-घर में प्रसिद्ध हो गया।

भारत-पाकिस्‍तान-बांग्‍लादेश में फैला

1947 में भारत के विभाजन ने जहां परिवारों को अलग किया। वहीं रूह अफजा की विरासत को भी दो हिस्सों में बांट दिया। बड़े बेटे हकीम अब्दुल हमीद ने अपनी मातृभूमि भारत में रहकर दिल्ली से 'हमदर्द' को जारी रखा। जबकि छोटे बेटे हकीम मोहम्मद पाकिस्तान चले गए। वहां उन्होंने कराची के अरामबाग में बेहद कठिन परिस्थितियों में 'हमदर्द पाकिस्तान' की नींव रखी। आगे चलकर 1971 में जब बांग्लादेश बना तो वहां शाखा का प्रबंधन स्थानीय कर्मचारियों को सौंप दिया गया। इस तरह पुरानी दिल्ली की छोटी सी दुकान से शुरू हुआ यह लाल शरबत भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों देशों में अपनी अलग और मजबूत पहचान बनाने में सफल रहा।

समाज कल्‍याण से जुड़ा ब्रांड

'हमदर्द' नाम का अर्थ ही है- दर्द में साथ देने वाला। हकीम मजीद के निधन (1922) के बाद उनकी पत्‍नी राबिया बेगम और बेटों ने 'हमदर्द ट्रस्ट' का गठन किया। इसके तहत कंपनी के शुद्ध मुनाफे का 85% हिस्सा सीधे समाज कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लगाने का नियम बनाया गया। परिवार अपने पास सिर्फ 15% मुनाफा रखता है। इसी जमा पूंजी से 1964 में तुगलकाबाद (दिल्ली) के पास 91 एकड़ जमीन खरीदकर चिकित्सा संस्थान खोले गए। इसने 1989 में 'जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय' का रूप लिया। आज भी रूह अफजा हमदर्द के रेवेन्‍यू का मुख्य आधार है। उससे होने वाली कमाई से हजारों छात्रों की शिक्षा और मरीजों का इलाज हो रहा है।

जूही चावला की एंट्री

अपने 120 साल के इतिहास में पहली बार अप्रैल 2008 में हमदर्द ने बॉलीवुड अभिनेत्री जूही चावला को रूह अफजा का पहला ब्रांड एंबेसडर बनाया। कंपनी का मकसद इस पारंपरिक ब्रांड को युवा पीढ़ी के बीच फिर से रीएनर्जाइज करना था। 'फ्रेशनेस का नया सुर' टैगलाइन के साथ आए इस टीवी कमर्शियल में जूही को एक थके हुए परिवार के लिए नींबू पानी, लस्सी और मिल्क शेक जैसे अलग-अलग ड्रिंक्‍स में रूह अफजा का जादू चलाते हुए दिखाया गया। इस रणनीतिक कदम ने पारंपरिक स्वाद और आधुनिक विज्ञापन शैली का ऐसा अनूठा मेल प्रस्तुत किया कि यह आज भी एक आइकॉनिक मील का पत्थर माना जाता है।

Advertisement