अपनी पहचान को बचाये रखने के लिए सरना धर्म कोड जरूरी
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश का आदिवासी समुदाय पिछले कई वर्षों से अपने धार्मिक अस्तित्व की रक्षा के लिए जनगणना कोड में प्रकृति पूजक आदिवासी-सरना धर्मावलंबियों को शामिल करने की मांग को लेकर संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि प्रकृति पर आधारित आदिवासियों के पारंपरिक धार्मिक अस्तित्व के रक्षा की चिंता निश्चित तौर पर एक गंभीर सवाल है। आज सरना धर्म कोड की मांग इसलिए उठ रही है ताकि प्रकृति का उपासक यह आदिवासी अपनी पहचान के प्रति आश्वस्त हो सके।
कई आदिवासी समूह विलुप्त होने के कगार पर, संख्या भी घटी
मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समुदाय में भी कई ऐसे समूह है, जो विलुप्ति के कगार पर हैं। सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर इन्हें संरक्षण नहीं दिया गया, तो इनकी भाषा, संस्कृति के साथ-साथ इनका अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। वहीं आदिवासियों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या आठ दशकों में 38 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत ही रह गई है।
पूरे विश्व में प्रकृति प्रेम का संदेश फैलेगा
हेमंत सोरेन ने कहा कि एक आदिवासी मुख्यमंत्री होने के नाते वे ना सिर्फ झारखंड, बल्कि पूरे देश के आदिवासियों के हित में सरना धर्म कोड पर निर्णय लेने की मांग करते है। उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण की रक्षा को लेकर चिंतित है, ऐसे समय में जिस धर्म की आत्मा ही प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा है,उसको मान्यता मिलने से भारत ही नहीं पूरे विश्व प्रकृति प्रेम का संदेश फैलेगा।











