कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पनगढ़िया ने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारतीय कारोबारियों ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच काम करना सीख लिया है। उन्होंने आयात शुल्क घटाने, कई क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) हटाने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए द्विपक्षीय निवेश समझौतों की समीक्षा करने की भी वकालत की।
7-8% की रफ्तार से बढ़ सकती है अर्थव्यवस्था
पनगढ़िया के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है। पिछले तीन साल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की करीब 10% सालाना वृद्धि भविष्य के लिए अच्छा संकेत है। महंगाई स्थिर रही है और चालू खाते का घाटा भी नियंत्रण में है।उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव के कारण लागत और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन भारतीय कारोबारियों में विकास को लेकर घबराहट नहीं दिखती। कोरोना महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से उबरी और अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत का निर्यात बढ़ा। इससे पता चलता है कि कारोबारियों ने अनिश्चित हालात से निपटना सीख लिया है।
कमजोर रुपया हमेशा नुकसान नहीं पहुंचाता
पनगढ़िया के मुताबिक, रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा होता है, लेकिन इससे भारतीय उत्पाद भी विदेशी सामान के मुकाबले सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आयातित तैयार सामान की कीमत बढ़ने से घरेलू कंपनियों को बाजार में मुकाबला करने का फायदा मिलता है। हालांकि, इससे उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले आयातित कच्चे माल और दूसरे इनपुट की लागत भी बढ़ती है। इसलिए इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि तैयार आयातित सामान की कीमत कितनी बढ़ती है और घरेलू कंपनियों की लागत पर कितना दबाव आता है।पनगढ़िया ने उदाहरण देते हुए कहा कि 1991 से 2002 के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 170% की गिरावट आई थी। इसके बाद रुपये की विनिमय दर लंबे समय तक लगभग उसी स्तर के आसपास रही। उनके मुताबिक, 2011-12 में भारत का निर्यात 300 अरब डॉलर के पार पहुंचा, लेकिन बाद में इसमें गिरावट आई और कोरोना महामारी के बाद ही फिर बढ़ोतरी हुई।



