उधम सिंह नगर की रहने वाली प्रेमा को पैरों में 100% विकलांगता है। उन्होंने एकतरफा मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया की खिलाड़ी फियोना को हराकर यह मेडल अपने नाम किया। प्रेमा का पदक जीतने का सफर आसान नहीं था। इस महीने की शुरुआत में हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने उनकी कहानी प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे उन्हें खेल किट, आवास और इंडोनेशिया से वापसी के लिए फ्लाइट टिकट के लिए पैसे जुटाने में परेशानी हो रही थी। प्रेमा ने कहा था कि उन्होंने एडमिनिस्ट्रेशन से फाइनेंशियल हेल्प के लिए कॉन्टेक्ट किया था, लेकिन किसी ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया।
एक उम्मीद की किरण तब जागी जब हल्द्वानी के रहने वाले हेमंत गौनिया उनकी मदद के लिए आगे आए और एक सोशल मीडिया अभियान शुरू किया। लोगों ने भरपूर मदद की और 10 दिनों के भीतर 1.2 लाख रुपये जुटाए गए, जिससे वह इस टूर्नामेंट में भाग ले सकीं।
अपनी जीत के बारे में बात करते हुए प्रेमा ने कहा, 'अगर राज्य सरकार ने मुझे खेल नीति के अनुसार नौकरी दी होती तो मैं किसी से पैसे नहीं लेती। मेरे पास जरूरी खेल इक्विपमेंट नहीं थे और यहां तक कि जिस कोर्ट में मैं अभ्यास करती थी वह भी असमतल (Uneven) था। लेकिन मैंने सब कुछ सहन किया और अपने देश का नाम रोशन किया। मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद देती हूं जिन्होंने मुझे इस ऐतिहासिक पल को अनुभव करने में मदद की।'
उन्होंने आगे कहा, 'मुझे अभी भी अपने टीनेज दिनों की याद आती है जब बच्चे मुझे व्हीलचेयर में देखकर बैडमिंटन खेलने से मना करते थे। तभी मैंने फैसला किया कि एक दिन मैं ऐसे मंच पर खेलूंगी जहां बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं। सभी चुनौतियों के बावजूद, मैंने अपना पहला इंटरनेशनल मेडल जीता है। मेरा अगला लक्ष्य ओलिंपिक में खेलना है, लेकिन वर्तमान में मेरे पास संसाधनों की कमी है। अगर मुझे अधिकारियों से सहायता मिलती है, तो मैं साबित कर सकती हूं कि विकलांग लोग भी खेलों में सफल हो सकते हैं।'
उन्होंने आगे कहा, 'मुझे अभी भी अपने टीनेज दिनों की याद आती है जब बच्चे मुझे व्हीलचेयर में देखकर बैडमिंटन खेलने से मना करते थे। तभी मैंने फैसला किया कि एक दिन मैं ऐसे मंच पर खेलूंगी जहां बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं। सभी चुनौतियों के बावजूद, मैंने अपना पहला इंटरनेशनल मेडल जीता है। मेरा अगला लक्ष्य ओलिंपिक में खेलना है, लेकिन वर्तमान में मेरे पास संसाधनों की कमी है। अगर मुझे अधिकारियों से सहायता मिलती है, तो मैं साबित कर सकती हूं कि विकलांग लोग भी खेलों में सफल हो सकते हैं।'











