शहरों में और गांवो में जो विकास के दावे किए गए वे सब खोखले साबीत हो गए
शहरों में सड़कों पर और अनेक मकान में पानी भर गया कई अंडरपास सड़के और तलघर पानी मैं डूब गए।
गांव में जहां सड़के नहीं थी टीवी पर अब सभी समस्याएं देखने को मिल रही है कोई भी चैनल ऐसा नहीं है कि जहां पर पानी पानी और बाढ़ का पानी देखने को नहीं मिल रहा है
क्या यही विकास है जो बरसों से सरकारे बातें कर रही है।
एक दो इंच बरसात में भी सड़कों पर पानी जमा हो जाता है और जब लगातार बारिश होती है तो बाढ़ का खतरा मंडराता है जबकि इतनी बरसात हर साल होती है और हर साल यही आलम रहता है, सरकार पहले से इस बाबत विकास के अजेन्डे में इन तकलीफों से मुक्ती के विकास क्यों नहीं करती। हां यदि बरसात के आंकड़े अलग होते तो बाढ़ का आना स्वभावीक है।
*नदी नाले किनारे कई मकान पानी में गिरते हुए देख रहे हैं, खास करके पहाड़ी क्षेत्रों में मकान और सडके गिरते टूटती कोई तस्वीर देखने में आ रही है।*
कई गांव में आज भी बीमार और गर्भवती महिलाओं को खटिया पर बिठाकर अस्पताल ले जाते हुए देख रहे है, कहीं पीने के पानी की तकलीफ है।
*किसी किसी गांव में तो वहां के युवकों की शादी ही नहीं हो रही क्योंकि वहां न सड़क है ना पुलिया है और कोई नाही कोई सुविधा है* और बिजली का तो यह आलम है कि आए गवारे बिजली बंद होती है कटऑफ होता रहता है जरा सी बरसात होगी या तेज हवा चलेगी तो तुरंत बिजली चली जाएगी।
*बिजली के तारों के नीचे अनगिनत पेड़ लगा रखे हैं।* प्रांत के मुख्यमंत्री अपने गुणगान करते फिर रहे हैं कि हमने इतने किलोमीटर रोड बनवा दिये, गांव गांव में पानी भिजवा दिया, गांव गांव में सड़के बनवा दी। सरकार सुशासन का दावा करती है परंतु जन अदालत में शिकायतों का अंबार लगा हुआ है।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)











