जर्मन बायोमैकेनिक्स का 'माइंड-बॉडी' गेम प्लान, जिसने नीरज चोपड़ा को जैवलिन थ्रो का किंग बना दिया

जर्मन बायोमैकेनिक्स का 'माइंड-बॉडी' गेम प्लान, जिसने नीरज चोपड़ा को जैवलिन थ्रो का किंग बना दिया
सबी हुसैन, नई दिल्ली: नीरज चोपड़ा ने रविवार देर रात इतिहास रचने के साथ ही अपना गोल्डन ग्रैंड स्लैम पूरा किया किया। उन्होंने हंगरी के बुडापेस्ट में अपनी दूसरी कोशिश में 88.17 मीटर के शानदार थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता। युवा जैवलिन थ्रोअर से 2018 में राष्ट्रमंडल, एशियाई खेलों, ओलिंपिक, डामयंड लीग और अब विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल तक का सफर जर्मन बायोमैकेनिक्स विशेषज्ञ डॉ. क्लॉस बारटोनिएट्ज से प्रभावित है। उन्होंने उवे होन के बाद 2019 के अंत से 25 वर्षीय भारतीय स्टार को प्रशिक्षण देना शुरू किया था।

सफलता के लिए सिंपल लॉजिक, सिर्फ प्रैक्टिस नहीं, सही प्रैक्टस पर जोर

बारटोनिएट्ज ने नीरज को कोचिंग देने के दौरान एक सिंपल लॉजिक को फॉलो किया है। वह अमेरिकी राष्ट्रीय फुटबॉल लीग (एनएफएल) के कोच विंस लोम्बार्डी के एक प्रसिद्ध कहावत में विश्वास करते हैं, जो अपने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण सत्र के दौरान सिर्फ अभ्यास नहीं करवाता है, बल्कि सही अभ्यास करवाता है, जो सिर्फ किसी एक वजह से नहीं होती। बारटोनिएट्ज नीरज को प्रशिक्षण देने में घंटों नहीं लगाते हैं, बल्कि भाला फेंकने की स्किल की कोचिंग, बेस्ट डाइड, तकनीकी बदलाव और स्पोर्ट्स साइंस का सही इस्तेमाल पर ध्यान देते हैं। साथ ही इस बात का ध्यान रखते हैं कि किस तरह से भारत के पोस्टर बॉय को चोटिल होने से बचाया जा सके।

इसलिए नीरज भीड़ से अलग हैं

नीरज ने अपने बचपन से कई कोचों से प्रशिक्षण लिया है। जयवीर सिंह, नसीम अहमद, काशीनाथ नाइक, वर्नर डेनियल्स, गैरी कैल्वर्ट और होन, लेकिन बारटोनिएट्ज का नीरज पर असाधारण प्रभाव पड़ा है। यही वजह है कि कोच का अनुबंध 2024 के पेरिस ओलिंपिक तक बढ़ा दिया गया है। हाल ही में बारटोनिएट्ज ने कहा था- नीरज मेहनती, फोकस्ड, अनुशासित, दृढ़ निश्चयी और पॉजिटिव हैं। ये वो चीजें हैं जो एक विश्व स्तरीय एथलीट में चाहिए और यही नीरज को भाला फेंक में विश्व विजेता बनाता है। उनकी कोशिश होती है कि जो भी करें सबसे बेहतर हो।

मन को शरीर पर हावी होने की स्ट्रेटजी

नीरज वर्षों से परिपक्व हुए हैं और उन्होंने 'मन को शरीर पर हावी' होने की समझ को विकसित किया है। कुछ भारतीय एथलीटों के विपरीत, जो चोटों को छिपाते हैं और आधे फिट होकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं, नीरज अपनी शारीरिक चोट या दर्द को बताते हैं और टूर्नामेंट से बाहर होने से डरते नहीं हैं। यह नीरज के लिए भी मददगार रहा है कि वह सरकार की ओर से मिली धनराशि के साथ यूरोपीय स्थानों में प्रशिक्षण लेकर टॉप पर पहुंचे हैं। विदेश में प्रैक्टिस को लेकर डॉ. कहते हैं- हमने हमेशा विदेश में, विशेष रूप से यूरोप में प्रशिक्षण लेना पसंद किया है, क्योंकि अधिकांश प्रतियोगिताएं वहीं होती हैं।

​नीरज ने किस इवेंट में जीते हैं गोल्ड मेडल​

  • 2021 ओलिंपिक खेल
  • 2023 विश्व चैंपियनशिप
  • 2022 हीरा लीग
  • 2018 एशियाई खेल
  • 2018 राष्ट्रमंडल खेल
  • 2017 एशियाई चैंपियनशिप
  • 2016 दक्षिण एशियाई खेल
  • 2016 विश्व जूनियर चैंपियनशिप​
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