अधिकारी ने कहा, 'अभी इस बारे में नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया है। सॉफ्टवेयर में नॉन-रिफंडेबल कोविड एडवांस के प्रॉविजन को डिसएबल करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि सब्सक्राइबर्स इसके लिए आवेदन न कर सकें।' जानकारों का कहना है कि ईपीएफओ के इस कदम में खपत के प्रभावित होने की आशंका है क्योंकि कोविड एडवांस को गैर-जरूरी खर्च के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका कहना है कि ईपीएफओ ने यह फैसला काफी देर से लिया है और इससे ईपीएफओ के पास फंड की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
देर से लिया फैसला
लेबर इकनॉमिस्ट केआर श्याम ने कहा कि ईपीएफओ की इस फैसिलिटी ने देश में खपत को बढ़ावा दिया लेकिन इसे लंबे समय तक जारी रखना सही नहीं था। इससे ईपीएफओ के लिए फंड की सप्लाई प्रभावित हुई है जिसे निवेश किया जा सकता था। यानी अप्रत्यक्ष रूप से ईपीएफओ के सब्सक्राइबर्स का रिटर्न प्रभावित हुआ है। ट्रेड यूनियन से जुड़े एक लीडर ने कहा कि यह सरकारी बाबुओं की तरफ से लापरवाही को दिखाता है। उन्होंने कहा, 'यह फैसला काफी देर से लिया गया जबकि सब जानते थे कि इसका इस्तेमाल इलाज के लिए नहीं हो रहा है। इससे सब्सक्राइबर्स की सेविंग कम हो गई है।'कुल 2.2 करोड़ सब्सक्राइबर्स ने कोरोना एडवांस सुविधा का लाभ उठाया जो ईपीएफओ के कुल सदस्यों की संख्या का एक तिहाई से ज्यादा है। यह सुविधा 2020-21 में शुरू हुई थी और तीन साल तक रही। इस दौरान पीएफ सब्सक्राइबर्स ने कोरोना एडवांस के रूप में 48,075.75 करोड़ रुपये निकाले। ईपीएफओ की ड्राफ्ट एन्युअल रिपोर्ट 2022-23 में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक ईपीएफओ ने 2020-21 में 17,106.17 करोड़ रुपये वितरित किए जिससे 69.2 लाख सब्सक्राइबर्स को फायदा हुआ। साल 2021-22 में 91.6 लाख सब्सक्राइबर्स ने इस सुविधा का लाभ उठाया और 19,126.29 लाख करोड़ रुपये निकाले।











