केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) ने सबसे बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया है। फोर्स ने आज से अपने 56 साल पुराने टेरिटोरियल कमांड मॉडल को खत्म करके फंक्शनल सेक्टर मॉडल अपना लिया है।
फोर्स अब तक जोन के हिसाब से काम करती थी। जैसे - मुंबई जोन के एक ही अधिकारी के पास पावर प्लांट भी होता था और कोयला खदान भी। इससे सुरक्षा मिली-जुली रहती थी।
नए मॉडल में एक जैसी इंडस्ट्रियल यूनिट को एक ही छतरी के नीचे लाया गया है। यानी देश भर के सारे पावर प्लांट, सारे स्टील प्लांट, सारे बंदरगाह अब एक-एक विशेष सेक्टर के अधीन होंगे।
इस बदलाव का असर बिजली, कोयला, स्टील, पेट्रोलियम और नैचुरल गैस यूनिट पर पड़ेगा। सरकारी इमारतों, संग्रहालयों, स्मारकों, समुद्री बंदरगाहों और दिल्ली मेट्रो जैसी की सुरक्षा के लिए कुल 11 सेक्टर बनेंगे।
सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव
अब तक CISF के फील्ड और प्रशासनिक ठिकाने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के आधार पर बने थे। इस वजह से एक ही फील्ड फॉर्मेशन अलग-अलग क्षेत्रों की इकाइयों की सुरक्षा संभालता था।
उदाहरण के लिए, किसी फील्ड फॉर्मेशन के पास बिजली और कोयला क्षेत्र की इकाइयों की जिम्मेदारी एक साथ होती थी। अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और हवाई अड्डों की सुरक्षा करने वाली CISF इकाइयां इसका अपवाद थीं। ये पहले से एक ही कमांड के तहत थीं।
CISF ने कहा कि इस बदलाव का मूल सिद्धांत यह है कि सुरक्षा केवल संपत्ति की जगह के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि संपत्ति क्या काम करती है और उसके प्रभावित होने का देश पर क्या असर पड़ेगा।
पोर्ट सेक्टर के नाम बदले
इस बदलाव के तहत मुंबई मुख्यालय वाले CISF के वेस्टर्न सेक्टर का नाम बदलकर वेस्ट कोस्ट पोर्ट सेक्टर कर दिया गया है। चेन्नई स्थित सदर्न सेक्टर का नाम ईस्ट कोस्ट पोर्ट सेक्टर किया गया है। 2025 में केंद्र सरकार ने CISF को समुद्री बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए नोडल बल बनाया था।
सरकार ने CISF को इस क्षेत्र के लिए रिकॉग्नाइज्ड सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन (RSO) के रूप में भी अधिकृत किया था।
1969 में बना था CISF
CISF का गठन 1969 में हुआ था। वर्तमान में बल में करीब 2.70 लाख कर्मचारी हैं। CISF सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण इकाइयों की सुरक्षा करता है। इसके अलावा, बल 70 से अधिक नागरिक हवाई अड्डों की सुरक्षा संभालता है। परमाणु और एयरोस्पेस क्षेत्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी CISF के पास है।

