थोड़ी और कमाई हो जाएगी तो दिवाली अच्छे से मनेगी… इसी उम्मीद में चारों युवक घर से निकले थे। किसी को चार बच्चों का पेट पालना था, तो किसी को चार साल की बेटी के भविष्य की चिंता थी। कोई त्योहार का खर्च जुटाना चाहता था, लेकिन इन उम्मीदों के बीच उनकी सिर्फ अर्थियां लौटीं।
31 अक्टूबर की रात करीब 10 बजे उज्जैन के एक होटल में सफाई के दौरान चारों युवक चैंबर में फंस गए। एक के बाद एक अंदर उतरते गए और दम घुटता गया। बचाने पहुंचे दो लोगों की भी तबीयत बिगड़ गई। करीब 90 मिनट तक रेस्क्यू चला। चारों को बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी सांसें थम चुकी थीं।
तीन सफाईकर्मी थे, जबकि एक होटल में सुपरवाइजर था। इस रिपोर्ट में पढ़िए चारों युवकों के परिवार की पीड़ा और उन घरों का दर्द, जहां इस बार दिवाली पर खुशियों की जगह मातम होगा।
4 साल की बेटी के सिर से उठा पिता का साया
हादसे ने कमलेश तंबोली के परिवार की खुशियां छीन लीं। अब घर में उसकी पत्नी और 4 साल की बेटी के भविष्य की चिंता है। कमलेश मजदूरी करके परिवार का पेट पालता था। जो काम मिल जाता, कर लेता था।
दिवाली से पहले घर का खर्च निकालने और बेटी के लिए त्योहार की खुशियां जुटाने के लिए वह अतिरिक्त पैसे कमाने में लगा था, लेकिन त्योहार से पहले ही उसकी जिंदगी खत्म हो गई। परिवार के सामने गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया।
12 हजार मिलती थी सैलरी, खर्च चलाना मुश्किल था
दूसरे मृतक वाहिद खान की जिंदगी भी परिवार की जिम्मेदारियों के बीच गुजर रही थी। वह ग्लोबल हॉस्पिटल में सफाई मित्र के रूप में काम करता था। करीब 12 हजार रुपए महीने की तनख्वाह में चार बच्चों का खर्च चलाना मुश्किल था। इसलिए अस्पताल की ड्यूटी पूरी करने के बाद वह अतिरिक्त काम करने निकल जाता था।
सुबह घर से निकला वाहिद रात को वापस नहीं लौटा। उसके इंतजार में बैठी पत्नी और चार बच्चों को अब जिंदगीभर उसके बिना रहना होगा। जिस पिता की कमाई से घर चलता था, उसी के जाने से परिवार के सामने रोजी-रोटी और बच्चों के भविष्य का सवाल खड़ा हो गया है।
दो दिन पहले ही पिता से मिला था मनोज
होटल में सुपरवाइजर मनोज मीणा भी अब अपने परिवार के बीच नहीं हैं। वह 2021 से उज्जैन में नौकरी कर रहा था। 29 अक्टूबर को वह झालावाड़ जिले के भुरमंडा गांव में अपने पिता से मिलने पहुंचा था। दो दिन परिवार के साथ बिताने के बाद 30 अक्टूबर को वापस उज्जैन लौट आया।
परिवार को शायद अंदाजा भी नहीं था कि मनोज से यह आखिरी मुलाकात होगी। बेटे को विदा करते समय पिता ने भी नहीं सोचा होगा कि अब वह कभी लौटकर नहीं आएगा। मनोज की शादी नहीं हुई थी। उसके जाने से परिवार ने अपना बेटा खो दिया।
अतिरिक्त काम से चलाता था खर्च
चौथा युवक नितिन भी नगर निगम में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करता था। कम वेतन में खर्च चलाना मुश्किल था, इसलिए वह दूसरी जगह भी सफाई का काम करता था। इस तरह मिलने वाली अतिरिक्त कमाई से वह अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करता था। नितिन की शादी नहीं हुई थी।
परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दिनभर मेहनत करता था, लेकिन इस हादसे ने उसकी जिंदगी भी छीन ली। अब परिवार के सामने नितिन के बिना आगे की जिंदगी बिताने का दर्द है।
सफाई के लिए निगम से नहीं कटवाई गई रसीद
नगर निगम स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी सत्यनारायण चौहान ने बताया कि होटल प्रबंधन ने सफाई के लिए नगर निगम से कोई रसीद नहीं कटवाई थी। निगम के पास टैंक की सफाई के लिए गाड़ियां और मशीनें उपलब्ध हैं। ऐसे में मजदूरों को टैंक के अंदर उतारकर सफाई कराना गलत है।
सांसद ने बताया- होटल मालिक देंगे 30-30 लाख
हादसे के बाद सफाई कर्मचारी संगठनों ने मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे और सरकारी नौकरी की मांग उठाई। वाल्मीकि सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष राकेश कोड़े ने प्रत्येक परिवार को एक-एक करोड़ रुपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को स्थायी सरकारी नौकरी देने की मांग की।
वहीं, सांसद अनिल फिरोजिया ने बताया कि होटल संचालक की ओर से हादसे में जान गंवाने वाले चारों युवकों के परिजन को 30-30 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
मशीन से होनी थी सफाई, फिर टैंक में क्यों उतारे मजदूर?
हादसे के बाद सफाई के तरीके और सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब चैंबर और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए नगर निगम के पास मशीनें और गाड़ियां उपलब्ध हैं, तो मजदूरों को टैंक के अंदर क्यों उतारा गया?
क्या होटल प्रबंधन ने उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी इंतजाम किए थे? रात के समय सफाई का काम किसके कहने पर कराया जा रहा था? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आने बाकी हैं।
उज्जैन-देवास रोड स्थित श्री गंगा होटल में चैंबर की सफाई के दौरान चार लोगों की मौत हो गई। चारों एक के बाद एक चैंबर में फंसते चले गए। उन्हें बचाने के लिए अंदर उतरे दो अन्य लोगों की भी तबीयत बिगड़ गई। दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

