कविताओं के जरिए भारतीय संस्कृति से जुड़ रहे भोपाल के युवा

कविताओं के जरिए भारतीय संस्कृति से जुड़ रहे भोपाल के युवा
भोपाल। एक समय था तब कविताएं बस किताब तक ही सीमित थी लेकिन अब बदलते दौर में कविता पाठ और रचनाओं का दौर ही बदल गया है। कोरोना के बाद आनलाइन माध्यम से कविता पाठ का दौर चला तो अब ओपन माइक और प्रकृति के बीच बैठकर कविताएं सुनाने और सुनने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसके लिए शहर के युवा भी पीछे नहीं हैं, वे समूह बनाकर इस कला को जी रहे हैं। वहीं कुछ युवा ओपन माइक के जरिए अपनी रचनाओं को सुना रहे हैं।

कविता के जरिए 1600 युवाओं का बनाया समूह

छतनारा फाउंडर व कवियत्री एवं मोहिनी शर्मा ने बताया कि कविता हमारी संस्कृति के केंद्र में है। कविता वह पुल है जो जीवन के हर रस की आवाजाही मुमकिन करता है। कविता सिर्फ शब्दों तक ही नहीं, कला और जीवन के हर पक्ष में विद्यमान रहती है। प्रकृति भी दुनिया की सुन्दरतम कविता है।इसीलिए छतनारा ग्रुप ने पोएट्स वाक के सहारे कविता को प्रकृति के बीच ले जाने की मुहिम शुरू की थी। तीन वर्षाें में छतनारा कविता और कला के विभिन्न रूपों में 1600 के लगभग लोगों को जोड़ चुका है। जिसमें ना सिर्फ भोपाल, बल्कि बाहर के शहरों के लोग भी कविता सुनने सुनाने आते रहे हैं। मैं कवियत्री के तौर पर कोशिश करती हूं कि जीवन की व्यथा और भारतीय लोक के आसपास अपनी रचनाएं रखूं। बाकी जो करती है, कविता ही करती है, कवि तो महज माध्यम होता है।

कविताओं में ग्रामीण जीवन और प्रकृति को उभारा

युवा कवि रवि पाटीदार ने बताया कि मेरी कविताओं की समझ की शुरुआत रामचरितमानस के पाठ करते हुए बचपन से ही बनने लगी थी। तुलसीदास जी की चौपाईयों के उच्चारण करते करते मुझे अक्षर, मात्रा और ध्वनि का खेल आकर्षित करने लगा। चूंकि मैं किसान हूं तो मेरी कविताओं में ग्रामीण जीवन और प्रकृति स्वतः ही चले आते हैं। साथ ही जीवन की परतों को कविता के माध्यम से खोलने और उनको लेकर अपना नजरिया भी कविता के जरिये कह पाता हूं। गालिब मेरे पसंदीदा शायर हैं और आबिदा जी की आवाज में वो जिस तरह खुलते हैं, उसने भी मेरी काव्य यात्रा में अहम योगदान दिया है।

कविता का जादू सबसे ज्यादा

विद्यार्थी फौजिया खान ने बताया कि कविता और कहानी में हमेशा से ही रुचि थी, लेकिन कविता का जादू सबसे ज्यादा मुझ पर छाया रहा। इसी कारण मैंने अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। साथ ही हिंदी कविता में रुझान छतनारा ग्रुप से जुड़ने के बाद बढ़ने लगा। मेरी कविताओं में मैं कोशिश करती हूं कि प्रकृति और महिलाओं के बीच एक संबध स्थापित करते हुए अपनी बात रख सकूं। साथ ही नवाचार के लिए मैंने कोशिश की है कि मैं हिंदी भाषा और अंग्रेजी भाषा की काव्य संस्कृति के अलग तत्वों को एक भाषा की कविता में पिरो सकूं।

शायरी में रिश्तों की बारीकियों और रोजमर्रा की जिंदगी

उर्दू अकादमी के तलाश ए जौहर के विजेता व मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा पुनर्नवा पुरस्कार से सम्मानित अभय शुक्ला युवा शायर हैं। उनकी अमेरिका और यूरोप में नियमित गजल प्रकाशित होती हैं। वह बताते हैं कि मेरा शायरी की ओर आना बशीर बद्र, फैज और फराज जैसे शोअरा की वजह से हुआ। मेरी और हमारे अहद के लगभग सभी युवा शोअरा की कोशिश शायरी में नए रंग उभारना, आज की जद्दोजहद को उसमें शामिल करना और इस बदलते दौर में कहन का अपना एक मुनफरिद लहजा इख़्तियार करना है। मेरी कोशिश रहती है कि शायरी में रिश्तों की बारीकियों और रोजमर्रा की ज़िंदगी के मसाइल को शुमार कर सकूं।

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