ऐसे हुई शुरुआत
15 राज्यों में फैला नेटवर्क
इस समस्या से निपटने के लिए मिलेट सिस्टर्स ने 'मिलेट सीजन' की शुरुआत की। यह खरीफ और रबी के बाद का एक छोटा खेती का चक्र होता है। इससे वे मौसम की मार से बच जाती हैं और कुपोषण से भी लड़ पाती हैं। जब उन्हें इस तरीके से सफलता मिलने लगी तो मल्लुवलासा और दूसरी महिलाओं ने दूसरे राज्यों के किसानों और NGO से बात की। इस तरह उनका नेटवर्क आंध्र प्रदेश के बाहर भी फैल गया। आज मिलेट सिस्टर्स नेटवर्क में 15 राज्यों की छोटी महिला किसान शामिल हैं। ओडिशा का 'निर्माण', डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी और तेलंगाना का 'पिलुपु' जैसे संगठन भी इसमें शामिल हैं।
मिलेट अपनाने के लिए किया जागरूक
ये महिलाएं किसान संगठनों, खाद्य उत्सवों, कार्यशालाओं और सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिये लोगों को जागरूक करती हैं। लोगों को पौष्टिक भोजन के अधिकार, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और स्थायी आजीविका के बारे में बताती हैं। उन्होंने सार्वजनिक खाद्य प्रणालियों में मिलेट को शामिल करने के लिए नीतिगत समर्थन भी हासिल किया है। मिलेट सिस्टर्स ने खेती का चेहरा बदलने के साथ महिलाओं को सशक्त भी बनाया है। जोगी नायडू सारदा वैली डेवलपमेंट समिति के सचिव हैं। यह समिति विशाखापत्तनम में कमजोर महिला किसानों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए काम करती है। यह समिति नेटवर्क के मूल संगठनों में से एक थी और नायडू मल्लुवलासा के मेंटर रहे हैं। नायडू कहते हैं कि नेटवर्क के माध्यम से महिलाओं को एहसास हुआ कि आर्थिक सुरक्षा ही सामाजिक उत्थान की कुंजी है। उन्होंने बेहतर दाम और सब्सिडी के लिए सौदेबाजी की और एक महिला बैंक की स्थापना की। विशाखापत्तनम में उन्होंने एक पूरी तरह से महिला पंचायत भी स्थापित की, जहां किसी भी पुरुष को सदस्यता या निर्णय लेने में कोई अधिकार नहीं था।
कॉर्पोरेट के दबदबे को चुनौती
मल्लुवलासा का कहना है कि आजकल जलवायु परिवर्तन पर ज्यादातर चर्चाएं 'शहरी-केंद्रित' होती हैं। ऐसे में उनका नेटवर्क विकेन्द्रीकृत ऐक्शन का एक मॉडल पेश करता है। वह कहती हैं, 'पिछले 3-4 सालों में मिलेट बहुत आगे बढ़ा है। लेकिन, अब बड़ी कंपनियां इसका फायदा उठा रही हैं। उन लोगों का क्या होगा जो दशकों से इसे उगा रहे हैं?' कंपनियों के इस दबदबे से ध्यान हटाने के लिए CEEW ने इस नेटवर्क को सम्मानित किया है।











