अमेरिका के विल्सन सेंटर में दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन ने एक्स पर लिखा, 'पीएम मोदी अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रंप की ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति से भारत चाबहार पोर्ट के विकास पर पड़ने वाले असर पर सफाई मांग सकते हैं। चाबहार पोर्ट भारत के मध्य एशिया के साथ ईरान और अफगानिसतान के रास्ते व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाने के प्रयास का हिस्सा है। नीतिगत खतरे की वजह से भारत की योजनाओं पर पानी फिर सकता है। इससे पहले 4 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किया था और ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव बनाने के लिए नए प्रतिबंधों को मंजूरी दी थी।
चाबहार पोर्ट यूरोप तक जाने का रास्ता
ट्रंप ने दावा किया कि इन प्रतिबंधों की वजह ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना है। इसी आदेश में चाबहार पोर्ट को दी गई छूट को खत्म या संशोधित करने का भी जिक्र है। भारत ने चाबहार पोर्ट को बनाने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किया है। भारत चाबहार पोर्ट के जरिए पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है ताकि आसानी से व्यापार किया जा सके। माना जा रहा है कि पीएम मोदी ट्रंप के साथ मुलाकात में इस मुद्दे को उठा सकते हैं। चाबहार पोर्ट का रणनीतिक लिहाज से काफी महत्व है। इसी वजह से पाकिस्तान उसका दोस्त चीन भी इस पर नजर गड़ाए हुए हैं।
भारत पाकिस्तान और चीन के ग्वादर बंदरगाह को जवाब देने के लिए इस पोर्ट का विकास कर रहा है। चाबाहर पोर्ट भारत और यूरोप तथा रूस के बीच के बीच व्यापार के लिए बनाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ साऊथ ट्रेड कॉरिडोर का हिस्सा है। यह कॉरिडोर 7200 किमी लंबा है और इसमें शिप, रेल और सड़क के जरिए सामानों को पहुंचाया जाएगा। यह कॉरिडोर भारत को ईरान, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ देगा। भारत ने साल 2016 में चाबहार पोर्ट के लिए समझौता किया था।











