भारत दुनिया में वनस्पति तेलों का सबसे बड़ा आयातक है। यह अगर खरीद कम करता है तो इससे मलेशियाई पाम तेल और अमेरिकी सोया तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीमित हो सकती है। वहीं, इससे स्थानीय वनस्पति तेलों की कीमतों और घरेलू तिलहन किसानों को मदद मिलेगी।
ग्लोबल मार्केट में पर्याप्त स्टॉक
इस महीने की शुरुआत में पाम तेल की कीमतें एक साल से भी ज्यादा समय के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थीं। इसकी वजह यह उम्मीद थी कि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी से बायोडीजल क्षेत्र में ट्रॉपिकल ऑयल की मांग बढ़ेगी।एक प्रमुख खाद्य तेल आयातक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'घबराकर खरीदने की कोई जरूरत नहीं है। वैश्विक बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। जैसे ही युद्ध खत्म होगा, कीमतें तेजी से नीचे आ जाएंगी।' इस कंपनी ने मार्च और अप्रैल की डिलीवरी के लिए आयात कम कर दिया है।भारत आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर
भारत अपनी वनस्पति तेल की जरूरतों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा करता है। अक्टूबर 2025 में समाप्त हुए मार्केटिंग वर्ष में भारत ने औसतन 13.6 लाख टन तेल प्रति माह आयात किया था।ग्लोबल ट्रेड हाउस के तीन डीलरों के अनुमान के अनुसार, मार्च में इंपोर्ट घटकर लगभग 11 लाख टन रहने की संभावना है। इसमें पाम तेल की खेप लगभग 6,80,000 टन रहने का अनुमान है। यह पिछले महीने के 8,47,689 टन से कम है।
वेजिटेबल ऑयल ब्रोकरेज और कंसल्टेंसी फर्म 'सनविन ग्रुप' के सीईओ संदीप बजोरिया ने कहा, 'भारतीय खरीदार पिछले कुछ दिनों से ज्यादातर इंतजार की मुद्रा में हैं। पाम तेल की कीमतों में हालिया गिरावट से कुछ खरीदारी हो सकती है। लेकिन, कुल मिलाकर बाजार का रुख अभी भी 'देखो और इंतजार करो' वाला ही है।'











