दशहरा और दशरथ दोनों में है दस

दशहरा और दशरथ दोनों में है दस
दशहरा और दशरथ दोनों में दस है। दस से अभिप्राय है दस इन्द्रियां। पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां। इन्हीं इन्द्रियों को पराजित करनें का अभिप्राय है यह पर्व। स्वयं पर विजय पाने वाला ही दशरथ कहलाता है। राम दशरथ की संतान हैं। राम कहीं बाहर से नहीं, इन्ही दशरथ से अर्थात् हमारे भीतर से ही प्रस्फुटित होते हैं। दशरथ हमारी आपकी आंतरिक क्षमता का प्रतीक पुरुष है, महाचिन्ह है। विजयादशमी अपने ही भीतर के सप्त सुप्त चक्रों पर आसीन 9 ऊर्जाओं और अपनी बाह्य शक्ति से नौ गुनी अधिक आंतरिक क्षमता के बोध से सर्वत्र विजय की महाअवधारणा है। नवरात्रि के 9 दिनों की साधना के पश्चात् स्वयं पर काबू पाकर विजय की दशमी अर्थात् विजयादशमी का सूत्रपात संभव है।* 
 *मूल भाव तो यही है कि स्वयं को जीते बिना जगत को या किसी को भी जीतोगे कैसे। किसी को जगाने से पहले स्वजागरण अनिवार्य है। अंतर्दृष्टि न हो तो भटकाव होगा। दृष्टि न हो तो उजाला समझाया नहीं जा सकेगा। किसी नेत्रहीन को उजाले की परिभाषा देकर देखिए, न आप उसे प्रकाश से परिचित करा सकेंगे, न ही वो बिना देखे रोशनी का मर्म समझ सकेगा। क्योंकि प्रकाश को बाहर से समझाने का कोई उपाय नहीं है, कोई अर्थ नहीं है...…और उसे समझने के लिए सिर्फ आंख ही खोलनी है दशहरा स्वजागरण प्रतीकपर्व है..........* 
 विक्रम चतुर्वेदी, लेखक,संपादक
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