यह सुनने में अच्छा लगता है कि भारत की बेरोजगारी दर आधिकारिक रूप से 3.2% है। लेकिन, धरातल पर हालात अलग हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2024-25 के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। भले ही 2017-18 के 6.1% के मुकाबले बेरोजगारी अब आधी रह गई है, लेकिन नौकरियों को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। कागजी आंकड़े और सच्चाई के बीच इस अंतर का एक कारण गिग इकॉनमी भी है, जहां अस्थायी और कम आमदनी वाले काम भी रोजगार में गिने जाते हैं। गिग इकॉनमी यानी जहां शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट या प्रॉजेक्ट आधारित काम होते हैं।
गिग इकॉनमी को नहीं मान सकते बेरोजगारी का समाधान, नौकरियों को लेकर लगातार बढ़ रहीं हैं चिंताएं
सुचिता दत्ता
यह सुनने में अच्छा लगता है कि भारत की बेरोजगारी दर आधिकारिक रूप से 3.2% है। लेकिन, धरातल पर हालात अलग हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2024-25 के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। भले ही 2017-18 के 6.1% के मुकाबले बेरोजगारी अब आधी रह गई है, लेकिन नौकरियों को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। कागजी आंकड़े और सच्चाई के बीच इस अंतर का एक कारण गिग इकॉनमी भी है, जहां अस्थायी और कम आमदनी वाले काम भी रोजगार में गिने जाते हैं। गिग इकॉनमी यानी जहां शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट या प्रॉजेक्ट आधारित काम होते हैं।
यह सुनने में अच्छा लगता है कि भारत की बेरोजगारी दर आधिकारिक रूप से 3.2% है। लेकिन, धरातल पर हालात अलग हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2024-25 के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। भले ही 2017-18 के 6.1% के मुकाबले बेरोजगारी अब आधी रह गई है, लेकिन नौकरियों को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। कागजी आंकड़े और सच्चाई के बीच इस अंतर का एक कारण गिग इकॉनमी भी है, जहां अस्थायी और कम आमदनी वाले काम भी रोजगार में गिने जाते हैं। गिग इकॉनमी यानी जहां शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट या प्रॉजेक्ट आधारित काम होते हैं।
