मधुमिता के पेट में पल रहा था बच्चा, SSP ने दोबारा कराया पोस्टमार्टम तो फंस गए अमरमणि त्रिपाठी

मधुमिता के पेट में पल रहा था बच्चा, SSP ने दोबारा कराया पोस्टमार्टम तो फंस गए अमरमणि त्रिपाठी
लखनऊ: कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी। हत्याकांड को कभी कानपुर आईआईटी में पढ़ने वाले छात्र की ओर घुमाने का प्रयास किया गया तो कभी दुबई में रहने वाले एक युवक की तरफ। मधुमिता के घर से मिली दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की मैग्नेटिक की के चलते क्रिकेट काउंसिल से जुड़े एक बड़े अधिकारी का नाम भी चर्चा में आ गया। हालांकि गर्भवती मधुमिता से मिले भ्रूण के डीएनए, उसके घर से बरामद एयर टिकट, अमरमणि त्रिपाठी के नाम के सिम कार्ड और अंडर गारमेंट्स ने कत्ल और अमरमणि के उसमें शामिल होने की कड़ियां इस कदर जोड़ीं कि रसूख और पहुंच के बाद भी अमरमणि खुद और पत्नी को सजा मिलने से बचा नहीं पाए।

यूपी के सबसे बहुचर्चित इस कत्ल की कहानी नौ मई 2003 में महानगर के निशातगंज स्थित पेपर मिल कॉलोनी से तब शुरू हुई थी, जब करीब 22 वर्षीय कवियत्री मधुमिता शुक्ला की हमलावरों ने उसके घर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। शुरू में लखनऊ पुलिस इस कत्ल को रंजिश और लूट के एंगल से खंगाल रही थी। केस ने तब सियासी करवट ले ली जब मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने माया सरकार के मंत्री और पूर्वांचल के बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी पर हत्या के लिए आरोप लगाए।

आधे रास्ते से वापस मंगाया गया मधुमिता का शव

पुलिस पोस्टमॉर्टम के बाद मधुमिता के शव को लखीमपुर के लिए रवाना कर चुकी थी। इसी बीच तत्कालीन एसएसपी अनिल अग्रवाल को पता चला कि मधुमिता 7 माह की गर्भवती थी। आनन-फानन में आधे रास्ते से उसके शव को मंगाकर उसका दोबारा पोस्टमॉर्टम करवाया गया। मधुमिता के पेट से मिले भ्रूण को डीएनए जांच के लिए फरेंसिक लैब भेजा गया। यह वह सबसे अहम साक्ष्य था, जिसने अमरमणि की कत्ल से सबसे मजबूत कड़ी को जोड़ा।

अमरमणि से जुड़ी कई कड़ियां

कत्ल के बाद पुलिस को मधुमिता के घर से मिसेज ए.एम त्रिपाठी के नाम से एयर टिकट मिले। इसके अलावा कई सिम कार्ड, मोबाइल फोन मिले। दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की मैग्नेटिक की भी मिली। इसके अलावा कुछ मेल अंडर गारमेंटस, सिम कार्ड और मोबाइल फोन मिले। इनके बारे में पड़ताल और फरेंसिक जांच हुई तो सभी कड़ियां अमरमणि से जुड़ गईं।

मामले की हुई सीबीआई जांच

हालांकि इस बीच पुलिस को घुमाने के लिए कुछ ऐसे किरदारों को भी पिक्चर में लाया गया, जिनका कत्ल से कोई लेना देना नहीं था। इसमें एक कानपुर आईआईटी में पढ़ने वाला और एक दुबई में रहने वाला युवक था। कानपुर में रहने वाले युवक को मधुमिता का पति तक बता दिया गया था। वहीं दुबई में रहने वाले युवक से मधुमिता की ट्रेन में मुलाकात हुई थी, जिससे कुछ बार मधुमिता की मोबाइल फोन पर बात हुई थी। सिर्फ इन्हीं बातचीत और मुलाकात के आधार पर उन्हें फंसाने की कोशिश हुई थी। सीबीआई जांच में इनकी कोई भी भूमिका नहीं मिली थी।

बचने के लिए करवाई सीबी सीआईडी जांच

नौ मई को हुई हत्या के आठ दिन बाद ही मामले की जांच सीबी सीआईडी को सौंप दी गई थी। सीबीसीआईडी को जांच दिया जाना उस समय यह माना जाता था कि मामले को ठंडे बस्ते में डालना है। करीब एक माह तक सीबीसीआईडी ने जांच की लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। इस दौरान विपक्ष के दबाव और सरकार पर उठ रहे सवालों के चलते 18 जून को मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश कर दी गई। पांच सितंबर 2003 में सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ले ली और उसके बाद अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि साक्ष्यों के शिकंजे में घिरते चले गए।

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