लखनऊ: 43 साल पहले मुरादाबाद में हुए भीषण दंगे की अब सार्वजनिक हुई जांच रिपोर्ट में अल्पसंख्यक वोटबैंक की राजनीति को लेकर कई अहम सवाल उठाए गए हैं। दंगे की जांच के लिए गठित आयोग ने कहा है, 'अल्पसंख्यकों को आम नागरिक समझने के बाद चुनाव के प्रयोजन के लिए उन्हें वोट की सौदेबाजी की मूल्यवान सामग्री समझेंगे, तो निश्चय ही इसके परिणाम अशुभ होंगे। इस जनसमुदाय से अपना स्वार्थ साधने के लिए इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे दिया गया।'
13 अगस्त, 1980 को मुरादाबाद में ईद की नमाज के दौरान प्रतिबंधित पशु के आने और नमाजियों को 'नापाक' किए जाने की अफवाह फैलाई गई, उस समय वहां 70 हजार से अधिक नमाजी थे। जस्टिस एमके सक्सेना की जांच रिपोर्ट के अनुसार यह अफवाह मुस्लिम लीग के कैंप के पास फैलाई गई। प्रशासन-पुलिस ने मौके पर पहुंचकर लोगों को शांत करवाया। प्रशासन जब तक ईदगाह पहुंचता यहां प्रतिबंधित पशु के साथ नमाजियों पर हमले की खबर फैला दी गई। इन अफवाहों ने हिंसा फैलाई और करीब तीन महीने तक मुरादाबाद और आसपास के शहर दंगे की आग में जलते रहे।
दंगों की तैयार की गई जमीन
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यूपी मुस्लिम लीग पार्टी के अध्यक्ष शमीम अहमद इन दंगों की जमीन लंबे समय से तैयार कर रहे थे। 1971 का लोकसभा चुनाव वह हार गए थे, तब भी उन्होंने सांप्रदायिक उपद्रव भड़काने का प्रयास किया था। 1974 में यूपी विधानसभा का चुनाव नजदीकी वोटों से हारने के बाद उन्होंने अल्पसंख्यकों की सहानुभूति हासिल करने की कवायद तेज की। हालांकि, 1977 के विधानसभा चुनाव में मिली भारी हार ने उनकी महत्वाकांक्षाओं को गहरा झटका दिया। मई, 1980 में जब उन्हें फिर विधानसभा का मुस्लिम लीग से टिकट मिला तो ध्रुवीकरण के प्रयास और तेज कर दिए।
अफवाह के तहत रची साजिश
मई में ही एक दलित लड़की के अपहरण और रेप की घटना में शमीम आरोपितों के साथ खड़े हुए और घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। पीड़ित लड़की की शादी के दिन भी बारात को लेकर विवाद पैदा किया गया और इससे दोनों समुदायों में हिंसक स्थिति उपजी। इस घटना की पृष्ठभूमि में प्रतिबंधित पशु की अफवाह रची गई, जिससे शक उसके पालक समुदाय पर जाए। ईद का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि उस दिन जुटान भी बहुत थी और भावनाओं को हवा देना भी आसान था। भगदड़ और गोलीबारी में हुई मौतों ने गुस्से को और भड़काया, जिससे कई की जान गई। आयोग ने रिपोर्ट में साफ कहा है कि कहीं भी प्रतिबंधित पशु आने का कोई सबूत नहीं मिला।
'दंगों के मुकदमों में फैसले कोर्ट से ही हों'
आयोग ने कहा है कि सांप्रदायिक तनाव की जमीन रचने वाले खास राजनीतिज्ञ व स्थानीय नेता होते हैं जो इससे अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का मौका देखते हैं। मुरादाबाद में भी यही हुआ। समुदाय विशेष पर नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान ने स्थिति खराब की। साधारण नागारिक कभी भी उपद्रव फैलाने में रुचि नहीं रखते, लेकिन सबसे अधिक नुकसान उनको ही उठाना पड़ता है। आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि दंगों के मामलों में फैसला कोर्ट में ही होना चाहिए। कोई भी मुकदमा वापस नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि इससे अविश्वास व कटुता पनपती है।