विश्व आटिज्म दिवस की पूर्व संध्या पर उन्होंने नवदुनिया से चर्चा में आटिज्म के विभिन्न पहलुओं पर बात करने के साथ ही समावेशिता और न्यूरो विविधता जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक विकास संगठन एसीएटी आधार परामर्श एवं चिकित्सा परिषद के एक साल के अभियान की घोषणा की।
बाल रोग विशेषज्ञ डा चावला ने बताया कि जो बच्चे 1-3 वर्ष आयु वर्ग में अत्यधिक स्क्रीन समय के संपर्क में रहते हैं उनमें वर्चुअल आटिज्म नामक बीमारी विकसित हो सकती है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां बच्चे में आटिज्म के लक्षण दिखाई देते हैं लेकिन वास्तव में वह आटिस्टिक नहीं होता है या जहां अंतर्निहित आटिज्म बढ़ जाता है। उनके अनुसार, जो बच्चे कोविड-19 लाकडाउन के दौरान एक से तीन वर्ष आयु वर्ग के थे वे विशेष रूप से वर्चुअल आटिज्म की चपेट में हैं। हमारी युवा पीढ़ी के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए माता-पिता, देखभाल करने वालों और समाज के लिए इस घटना को समझना आवश्यक है।
बीमाारी नहीं है आटिज्म
आटिज्म निदान पर 20 साल से काम कर रहीं डा जगमीत कौर ने बताया कि आटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि अनुवांशिक और पर्यावरणीय कारणों से हाेने वाली न्यूरो की समस्या है। आटिज्म से पीड़ित बच्चा समाज और सुमदाय से कटकर खुद में खोया रहता है। ऐसे बच्चे किसी से नजरें नहीं मिलाते और बातचीत नहीं करते हैं। इन्हें प्रकाश और आवाज पसंद नहीं आती और किसी चीज का डर भी इन्हें नहीं होता है। हमारे सेंटर में थैरेपी और काउंसलिंग के माध्यम से इन विशेष बच्चों का उपचार किया जाता है। अब तब 160 बच्चे ठीक होकर गए हैं और उन्हें मेनस्ट्रीम स्कूलों में दाखिला मिला है।
ग्रेजुएशन सेरेमनी
आधार केंद्र की ओर से आटिज्म जागरूकता दिवस और ग्रेजुएशन सेरेमनी का आयोजन का मंगलवार को एप्को के कांफ्रेंस हाल में किया जा रहा है। कार्यक्रम में केंद्र से उपचारित हुए दस बच्चों को प्रमाण पत्र और ट्राफी दी जाएगी। इस मौके पर बच्चे लाइट इट अप ब्लू की थीम पर सांस्कृतिक प्रस्तुति देंगे और संगठन की 20 साल की उत्कृष्ट यात्रा पर आधारित डक्यूमेंट्री का अनावरण भी इस मौके पर होगा।











