फरवरी में RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी। इससे घर खरीदने वालों को थोड़ी राहत मिली थी। लेकिन, इस कटौती और बैंकों में रिकॉर्ड पैसे डालने के बाद भी कंपनियों के लिए कर्ज लेना सस्ता नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कंपनियों के लिए ब्याज दर इस बात पर निर्भर करती है कि बैंकों को पैसा जुटाने में कितना खर्च आ रहा है। इसे एक साल की मार्जिनल कॉस्ट ऑफ लेंडिंग रेट्स (MCLR) कहते हैं। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक साल की MCLR 9% पर स्थिर है। यह RBI के ब्याज दरें बढ़ाने के बाद से सबसे ज्यादा है।
आरबीआई ने तो रेट कट किए, बाजार में पैसा भी आया... लेकिन आपकी ईएमआई नहीं बदली, जानें क्यों?
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जनवरी के मध्य से बैंकों में 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डाले हैं। यह पैसा बॉन्ड खरीदकर, विदेशी मुद्रा स्वैप करके और अप्रैल की शुरुआत में मैच्योर होने वाले रेपो के जरिए डाला गया है। RBI चाहता है कि बैंकों के पास पर्याप्त पैसा रहे। इससे वो अपनी ब्याज दर में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचा सकें। इसलिए RBI मंगलवार को बॉन्ड दोबारा खरीदकर 50,000 करोड़ रुपये और डालेगा।
