पाकिस्तान ने बीते साल सऊदी अरब से बहद अहम रक्षा समझौता किया है। सितंबर में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं और सैन्य नेतृत्व ने समझौते का ऐलान किया था। नाटो स्टाइल के इस समझौते में किसी एक देश पर अटैक को दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। वहीं सऊदी अरब और ईरान के घटनाक्रम पर पाकिस्तान ने चुप्पी साध रखी है।
पाकिस्तान ने जंग का ऐलान क्यों नहीं किया?
पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट होने के बावजूद उसने मिलिट्री एक्शन के बजाय एकजुटता को प्राथमिकता दी है। पाकिस्तान ने ईरान का हालिया घटनाक्रम पर बहुत संतुलित बयानबाजी की है। इसकी एक अहम वजह उसके पड़ोसी देश ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और डिप्लोमैटिक रिश्ते हैंइस्लामाबाद और तेहरान का हाई-लेवल विजिट और क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग सहित द्विपक्षीय जुड़ाव है। ईरान ने पिछले क्षेत्रीय संकटों के दौरान पाकिस्तान के समर्थन की सार्वजनिक रूप से तारीफ की है, जो पारंपरिक रूप से दोस्ताना रिश्तों को दिखाता है। सऊदी से उसका संबंध बहुत पुराना है तो अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान के रिश्ते हालिया महीनों में काफी बेहतर हुए हैं।
पाकिस्तानी जनता ने सड़कों पर आकर ईरान पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन किया है और अमेरिकी कॉन्सुलेट को निशाना बनाया है। यह दिखाता है कि ईरान के खिलाफ कोई भी डायरेक्ट मिलिट्री एक्शन लेना पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए कितना मुश्किल हो गया है। ऐसा कदम उनको अपने ही लोगों के बीच में अलोकप्रिय कर सकता है।
ईरान से युद्ध पाकिस्तान को पड़ेगा भारी
ईरान के साथ हॉट वॉर में जाना इस्लामाबाद के लिए इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि दोनों एक लंबा अस्थिर बॉर्डर शेयर करते हैं। ऐसी कोई लड़ाई पाकिस्तान की अपनी आबादी के अंदर अंदरूनी सेक्टेरियन फाल्ट लाइन को भड़का सकती है। अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के खिलाफ कराची और लाहौर जैसे पाकिस्तानी शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं।पाकिस्तानी जनता ने सड़कों पर आकर ईरान पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन किया है और अमेरिकी कॉन्सुलेट को निशाना बनाया है। यह दिखाता है कि ईरान के खिलाफ कोई भी डायरेक्ट मिलिट्री एक्शन लेना पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए कितना मुश्किल हो गया है। ऐसा कदम उनको अपने ही लोगों के बीच में अलोकप्रिय कर सकता है।











