यह रकम H-1B वीजा पर पहली बार नौकरी करने वालों की सालाना सैलरी से भी ज्यादा है। इतना ही नहीं, यह H-1B वीजा धारकों की औसत सैलरी के 80% से भी ज्यादा है। भारत को इस बदलाव से सबसे ज्यादा नुकसान होगा। यह भारत और अमेरिका के रिश्तों के लिए भी अच्छा नहीं है।
क्या है H-1B वीजा और किसके लिए जरूरी?
H-1B अमेरिका का वीजा प्रोग्राम है। इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रख सकती हैं। ये नौकरियां आमतौर पर IT, इंजीनियरिंग, गणित, मेडिकल और साइंस जैसे फील्ड में होती हैं। इन नौकरियों के लिए खास तरह के हुनर और जानकारी की जरूरत होती है।यह वीजा इसलिए बनाया गया है ताकि अमेरिका में हुनरमंद लोगों की कमी को पूरा किया जा सके। यह वीजा आमतौर पर तीन साल के लिए मिलता है, जिसे छह साल तक बढ़ाया जा सकता है। इस वीजा के जरिए कर्मचारी अमेरिका में रहकर कानूनी तौर पर काम कर सकता है।
सैलरी से ज्यादा हुई वीजा फीस
ट्रंप के इस नियम के बाद वीजा की सालाना फीस कई कंपनियों के कर्मचारियों की औसतन सालाना सैलरी से ज्यादा हो गई है। इसमें भारतीय कंपनी विप्रो सबसे आगे है। वहीं कई कंपनियों के कर्मचारियों की सालाना सैलरी वीजा सैलरी के लगभग बराबर हो गई है। वहीं कई की सैलरी और वीजा फीस में बहुत ज्यादा अंतर नहीं बचा हैविप्रो की औसतन सालाना सैलरी 93,174 डॉलर प्रति वर्ष है जो अब H-1B वीजा की सालाना फीस एक लाख डॉलर के मुकाबले काफी कम रह गई है। वहीं कॉग्जिनेंट, टीसीएस और इंफोसिस में सालाना औसतन सैलरी एक लाख डॉलर से कुछ ज्यादा ही है। इनके अलावा एचसीएल अमेरिका में भी औसतन सालाना सैलरी करीब 1.05 लाख डॉलर है।
साल 2024 में 399,395 H-1B वीजा मंजूर किए गए थे। इनमें से 71% वीजा भारतीयों को मिले थे। चीन दूसरे नंबर पर था, जिसे सिर्फ 11.7% वीजा मिले थे। हमेशा से ही भारत को सबसे ज्यादा H-1B वीजा मिलते रहे हैं। इसलिए, नए नियमों से भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होगा।
भारत को सबसे ज्यादा नुकसान
वीजा की फीस बढ़ने से अमेरिका में नौकरी करने जाने वाले भारतीयों की संख्या में गिरावट आ सकती है। वीजा की फीस, कर्मचारी की सालाना सैलरी से ज्यादा होने पर कंपनियां शायद ही वीजा के लिए अप्लाई करेंगी।साल 2024 में 399,395 H-1B वीजा मंजूर किए गए थे। इनमें से 71% वीजा भारतीयों को मिले थे। चीन दूसरे नंबर पर था, जिसे सिर्फ 11.7% वीजा मिले थे। हमेशा से ही भारत को सबसे ज्यादा H-1B वीजा मिलते रहे हैं। इसलिए, नए नियमों से भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होगा।











