कीमतों पर कंट्रोल कैसे रख पाई सरकार?
- इसका एक बड़ा कारण यह है कि केंद्र सरकार ने दावा किया है कि उसके पास 60 दिनों का बफर स्टॉक मौजूद है।
- इसमें उसके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के पास मौजूद स्टॉक शामिल हैं।
- पिछले कुछ सालों में भारत सरकार रूस से रियायती दरों पर क्रूड की खरीद लगातार बढ़ा रही है।
- इससे कंपनियों को अपनी लागत कम रखने और अतिरिक्त मार्जिन बनाने में मदद मिली है।
- भारत ने 'ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा' शुरू किया है, जो एक रणनीतिक नौसैनिक मिशन है।
- इस मिशन का उद्देश्य मिडिल ईस्ट के संघर्ष-ग्रस्त जलक्षेत्रों से होकर गुजरने वाली देश की महत्वपूर्ण ऊर्जा सप्लाई की सुरक्षा करना है।
तेल कंपनियों की स्ट्रैटेजी कैसे आई है काम?
- तेल मार्केटिंग कंपनियां भी बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए रणनीतिक रूप से काम कर रही हैं।
- उन्होंने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ तुरंत उपभोक्ताओं पर नहीं डाला है।
- कंपनियों ने क्रूड कीमतें कम होने के दौरान बनाए गए मार्जिन का इस्तेमाल अचानक उछाल आने पर बढ़ी हुई लागत की भरपाई करने के लिए किया है।
दुनियाभर में बढ़ी हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि पिछले एक महीने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। ये 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इसके चलते दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ गई हैं।सरकार को कितना उठाना पड़ा नुकसान?
पुरी ने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उछाल के बीच तेल कंपनियों को हो रहे नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार ने अपने टैक्स रेवेन्यू में भारी कटौती की है। यह नुकसान पेट्रोल के लिए लगभग 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल के लिए लगभग 30 रुपये प्रति लीटर होने का अनुमान है।उन्होंने यह भी बताया कि ग्लोबल स्तर पर ईंधन की कीमतों में उछाल को देखते हुए एक्सपोर्ट टैक्स भी लगाए गए हैं। अब पेट्रोल या डीजल का निर्यात करने वाली किसी भी रिफाइनरी को एक्सपोर्ट टैक्स का भुगतान करना जरूरी होगा।











