13 हजार फीट पर 78 बुग्याल बुग्याल उच्च हिमालयी क्षेत्र में जैव विविधता और मृदा संरक्षण के कुदरती कवच हैं। निचले इलाकों में बहती जलधाराओं के प्रमुख स्रोत भी बुग्याल हैं। जाड़ों में बर्फ से ढके ये मैदान मई में बर्फ पिघलने पर घास, औषधियों और फूलों से निखर उठते हैं। पशुचारण, पर्यटन, ट्रैकिंग और धार्मिक-सांस्कृतिक यात्राओं के लिहाज से भी इनका खासा महत्व है। वन विभाग के अनुसार, उत्तराखंड के छह जिलों में 11 से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर कुल 78 बुग्याल हैं। वेदनी, आली, दयारा और पंवालीकांठा प्रमुख हैं। ये अंतिम मोटर मार्ग से औसतन 18 से 25 किमी दूर हैं।
ग्लेशियरों पर मौसमी बदलावों का असर अब वैज्ञानिक सच्चाई बन चुका है। ग्लेशियरों के साए में पलते बुग्याल भी इससे अछूते नहीं। हाल में चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र, गोपेश्वर के दल ने 12 हजार फीट की ऊंचाई पर पंवालीकांठा पहुंचकर जैव विविधता और पारिस्थितिक बदलावों का अध्ययन किया। वर्षाचक्र में गड़बड़ी, भूस्खलन, बादल फटना, ग्लेशियरों से मलबा, परागण करने वाले कीटों का लुप्त होना, मानवीय हस्तक्षेप और अनियंत्रित पशुचारण से बुग्याल संकट में हैं। भू-कटाव रोकने के लिए बिछाए गए जूट और नारियल के जाल भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
पारंपरिक ज्ञान का लाभ
वन विभाग के मुताबिक, अतिशय पर्यटन, कैंपिंग, पशुचारण और भारी खुरों वाले जानवर बुग्यालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अनुपयोगी पशुओं को यहां छोड़ने का चलन बढ़ रहा है। पंवालीकांठा में करीब 200 गाय-बैल और भैंस हैं। गूजर समुदाय भी दर्जनों भैंस और घोड़े खच्चरों के साथ यहां रहता है। जानवरों के खुर और घोड़े खच्चरों की लोहे की नाल बुग्याल को नुकसान पहुंचा रही है।ग्रामीणों के अनुसार, भौरे, तितलियां और अन्य परागणकारी कीट लुप्त हो रहे हैं। फसलों, फलों और सब्जियों में परागण घटने से फफूंद लग रही है। 'बुग्याल संरक्षण' में बफर क्षेत्र की बस्तियों और उनकी चिंताओं को शामिल करना जरूरी है। समुदायों को प्रमुख हितधारक बनाकर उनके पारंपरिक ज्ञान का लाभ लिया जाए। कैंपिंग की बजाय सतत पर्यटन को बढ़ावा मिले। अनुपयोगी पशुओं के लिए अलग बाड़े बनें। धार्मिक-सांस्कृतिक मॉडल से दोहन सीमित हो और शोध संस्थानों की मदद से डेटाबेस तैयार किया जाए।
