साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट कहती है कि शेख हसीना के 2024 में सत्ता से हटने के बाद ढाका में इस्लामाबाद का दखल तेजी से बढ़ा है। दूसरी ओर चीन ने 2021 में नाेपीडा में सेना ने तख्तापलट करके चुनी हुई सरकार को हटाने के बाद से म्यांमार में अपना प्रभाव बढ़ाया है। वह म्यांमार में सभी पक्षों से संपर्क रखता है।
म्यांमार क्यों भारत की बड़ी चुनौती
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के श्रीराधा दत्ता का कहते हैं, 'भारत को बांग्लादेश की तुलना में म्यांमार के साथ अपने संबंधों को संभालने में अधिक जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत ने सेना और सत्ता प्रतिष्ठान के साथ काम किया है लेकिन सिविल सोसायटी चाहती है कि म्यांमार में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत ज्यादा गहराई से जुड़े, जो आसान नहीं है। पाकिस्तान की म्यांमार में एंट्री इसे और मुश्किल बना सकती है।साल 2021 के तख्तापलट के बाद से म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भारत ज्यादा सतर्क है। चीन लंबे समय से म्यांमार की सेना को हथियार और ट्रेनिंग दे रहा है। पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बुलावे पर शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए म्यांमार के जुंटा नेता मिन आंग हलिंग ने तियानजिन का दौरा भी किया है।
भारत और चीन का मुकाबला
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के अंगशुमन चौधरी कहते हैं, 'भारत उम्मीद कर रहा था कि जुंटा के साथ उसके लंबे समय से चले आ रहे संबंध म्यांमार पर चीन के प्रभाव का मुकाबला कर सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ है, बीजिंग ने जुंटा और म्यांमार के शक्तिशाली जातीय सशस्त्र संगठनों दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं।'म्यांमार में भारत और चीन कई बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। भारत की भागीदारी में राखिन में सिटवे बंदरगाह को समुद्र, नदी और सड़क मार्ग से कोलकाता को जोड़ने के लिए 484 मिलियन अमेरिकी डॉलर के कॉरिडोर का विकास शामिल है। वहीं चीन युन्नान प्रांत को राखिन के क्यौकफ्यू शहर से जोड़ने वाली अरबों डॉलर की रेल और सड़क परियोजना का विकास कर रहा है।











