आधुनिकता के नाम पर पसरा वहशीपन और खोखलापन

आधुनिकता के नाम पर पसरा वहशीपन और खोखलापन
आधुनिकता के नाम पर पसरा वहशीपन और खोखलापन पूरे समाज को ही लील गया है। जब आंतरिक शक्ति लुप्त हो जाती है तो व्यक्ति अपने को हट कर दिखाने के लिये दूसरों को आकर्षित करने के लिये किसी भी हद तक गिरने को तैयार है।
व्याप्त नंगापन इसी दिशा की ओर बढ़ते कदम हैं। लड़के क्या लड़कियाँ दूरदर्शन और सिनेमा का अंधानुकरण, अनुसरण करते हैं। वहाँ अंग प्रदर्शन से वे अपना कैरियर का ग्राफ़ बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
कुछ हट कर करने के प्रयास में फटे कपड़े पहनने का फ़ैशन इतना हावी हुआ है की चिथड़े आज हज़ारों लाखों में बिक रहे हैं।
हम मानसिक और सामाजिक रूप से विकलांग हो चुके हैं, और निश्चित रूप से बीमार तो हैं ही!!!
एक समय था जब घर के बजुरगों के सामने स्त्रियाँ नंगे सिर भी नहीं जाती थी, हमे अपनी माँ व दादी का इसी तरह से देखा है। एक बार आधुनिकता के जोश में परिवार की एक महिला के यह कहने पर कि हम घूँघट नहीं करेंगे, घर के बजुरग बोले ठीक है हम लोग ही घूँघट कर लेंगे या फिर घर ही नहीं आयेंगे ।
हर एक परिवेश में पहनने ओढ़ने का तरीक़ा अलग होता है, समुद्र तट पर या छुट्टियों में आप जिस तरह की वेशभूषा पहनते हैं वह आप घर के बड़ों के सामने पहनेंगे तो उनका असहज होना स्वाभाविक ही है।
परिवार में एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करना बहुत ज़रूरी होता है और मर्यादा भी बनी रहती है। किंतु आज युवक युवतियाँ इस बात को समझने में असमर्थ हैं और नाहक कटुता व आक्रोश ही बढ़ता है।
वह दिन दूर नहीं जब हम पुन: आदिवासियों की तरह मात्र पत्तों और तने की छाल मात्र से ही लोगों को कारों से उतरते देखेंगे, कयूंकि यही डिज़ाइनर कपड़े बन जायेंगे। बड़ी पीढ़ी द्वारा फ़ैशन को कोसने से कुछ नहीं होगी यह सोच एक दिन में नहीं बनती बचपन से ही बनती है।
बचपन में हम बच्चा है कहकर उसकी गाली पर भी हंस देते हैं, ऊटपटांग  फ़ैशन के कपड़े बच्चों को पहनाते हैं और जब यही उनकी मानसिकता बन जाती है तो संस्कारों का ढोल पीटने लगते हैं।

संस्कार क्या हैं जो हम बार बार करते हैं वही हमारा संस्कार बनता है। घर में जब मा-दादी माँ सुबह सुबह पूजा की घंटी बजाते हुये भजन कीर्तन गाती थी तो बिस्तर में पड़े पड़े ही आत्मा जागृत हो जाती थी और कानों में उनके मधुर बोल मिश्री की तरह घुल जाते थे जो आज स्वयं दादी बनने के बाद भी वह गूंज कानों में झंकारित होती है।

बच्चों का हर काम बड़ों या नौकरों द्वारा किया जाना, बदतमीज़ी से बोलना, संस्कार विहीनता, चालाकी,धूर्त पन ये सब एक दिन में नहीं आता। वे घर के बड़ों को जैसा करते देखते हैं वैसा ही करते है ।

जब आप में देने का संस्कार पनपता है तो आप में स्नेह शील  स्वत : ही पनपते हैं।आज कोई मीठा बोलता है तो उसे कमजोरी समझ लिया जाता है और उसका दोहन करना हर कोई अपना हक़ समझ लेता है।
अपने बच्चों को संस्कारित बनाने के लिये पहले हमें स्वयं संस्कारित बनना आवश्यक है।

डरने की नहीं कुछ करने की ज़रूरत है, हमें अपने आपको बदलना होगा वरना बहुत देर हो जायेगी।

Advertisement