भारतीय न्याय संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पर कार्यशाला

भारतीय न्याय संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पर कार्यशाला

नए कानूनों में मॉब लिंचिंग को अपराध के तौर पर परिभाषित किया गया है। यानी अब जाति, नस्ल, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान या भाषा के कारण यदि किसी की हत्या की जाती है तो आरोपियों को 7 साल तक की सजा हो सकती है। ऐसे हमले में कोई स्थायी विकलांग हुआ तो आरोपी को 10 साल या आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।

अब तक पुलिस आईपीसी की धारा 302 और एक से ज्यादा आरोपी यानी धारा 34 के तहत ये अपराध दर्ज करती रही है। ऐसे ही मानहानि या 5000 रुपए से कम की चोरी के मामलों में मजिस्ट्रेट सामुदायिक सेवा की सजा दे सकेंगे। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-2023 एक जुलाई से देश में लागू होने जा रहे हैं। इसे लेकर पीआईबी ने शुक्रवार को एक कार्यशाला का आयोजन किया।

महिला संबंधी अपराधों पर एक नजर...

  • महिला-बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़ी करीब 35 धाराएं, जिनमें 13 नए प्रावधान और बाकी में संशोधन किए गए हैं।
  • गैंगरेप में 20 साल तक या आजीवन कारावास।
  • नाबालिग से गैंगरेप में आजीवन कारावास या मौत की सजा।
  • झूठे वादे या पहचान छिपाकर यौन संबंध बनाना अब अपराध।
  • पीड़िता के घर पर उसके परिजनों और महिला अधिकारी की मौजूदगी में बयान दर्ज होंगे।

फरियादी को भी मिलेगी चार्जशीट की एक कॉपी

कार्यशाला में डीसीपी जोन-1 प्रियंका शुक्ला और एडीपीओ प्रियंका उपाध्याय ने नए कानूनी प्रावधानों के बारे में समझाया। डीसीपी ने कहा कि अब तक चार्जशीट की प्रति केवल आरोपी को दी जाती थी, अब फरियादी को भी एक कॉपी दी जाएगी। एडीपीओ ने बताया कि भारतीय न्याय संहिता में महिला-बच्चों के खिलाफ अपराध पर एक नया अध्याय जोड़ा है। इन कानूनों में इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल एविडेंस को भी साक्ष्य के तौर पर माना जाएगा।

कानूनों में ये भी बदलाव

  • भगोड़े अपराधी यदि दोषी पाए गए तो 10 साल, आजीवन कारावास या मौत की सजा।
  • ई-रिकॉर्ड, जीरो एफआईआर, ई-एफआईआर और चार्जशीट डिजिटल होंगी।
  • 7 साल या इससे ज्यादा की सजा के मामलों में फॉरेंसिक जांच अनिवार्य होगी।
  • घर की तलाशी में पुलिस को वीडियोग्राफी करनी होगी।
  • बलात्कार पीड़िता के ई-बयान दर्ज किए जाएंगे।
  • गवाह, अभियुक्त, विशेषज्ञ और पीड़ित अदालत में वर्चुअल पेश हो सकेंगे।
  • 3 साल से कम सजा वाले मामलों या 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की गिरफ्तारी से पहले मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी जरूरी।

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