ईरान और इजराइल के बीच जारी भीषण जंग के बीच दूर की कौडी लग सकती है, लेकिन अप्रभावी नहीं है। जिस दिशा में मोड़ ले रहे हैं, उससे लगता है कि आने वाले समय में पाकिस्तान भी इजराइल पर कायम रह सकता है। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान परमाणु अस्त्रों को नष्ट नहीं करना चाहता, पाक सरकार परमाणु अस्त्रों का प्रथम परमाणु अस्त्रों को नष्ट नहीं करना चाहती तथा पाकिस्तान के इस्लामिक कट्टरपंथियों को खुला आम समर्थन देना है, जो सारी दुनिया के लिए खतरा बने हुए हैं।
पाकिस्तान, भारत समेत दुनिया के नौ देशों में शामिल है, जहां के पास परमाणु ताकतें हैं और परमाणु अस्त्र भी हैं। जब पाकिस्तान ने भारत की प्रतिस्पर्द्धा में परमाणु विस्फोट कर खुद को अपने कब्जे में लेने की सेना घोषित कर दी तो सबसे ज्यादा खुशी की बात यह थी कि ईरान जैसे इस्लामिक देश का उदय हुआ, जो खुद भी लंबे समय से एटम बम बनाने की कोशिश कर रहा था, वे इस संप्रदाय में अमेरिका और यूरोपीय देशों का एकाधिकार तोड़ना चाहते थे। इजराइल ने अपने परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए खतरे में डाल दिया है और ईरान के ऐसे प्रयासों को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अन्य पाक का एटम बम बनाने वाले परमाणु वैज्ञानिक डा. अब्दुल कादिर खान थे, जो कभी भोपाल से ही पाकिस्तान गए थे। उन्हें पश्चिमी देशों ने 'परमाणु खिजाहादी' कहा। हालांकि बाद में कादिर की भी पाक बेकरी हुई, वो अलग बात है। पाकिस्तान ने नीदरलैंड से जो परमाणु बम विस्फोट किया, उसके जरिए उसे अमेरिका पश्चिमी देशों ने 'इस्लामिक बम' का नाम दिया, क्योंकि यह दुनिया के बहुसंख्यक मुस्लिम देशों की परमाणु शक्ति हासिल करने की ताकत हासिल कर चुका था। परमाणु बम की ताकत ने ही पाकिस्तान में मुस्लिम देशों का चौधरी बनने की हसरत जगाई। इस बीच ईरान में भी परमाणु शक्ति हासिल करने की पूरी कोशिश की जा रही थी, जिसमें अमेरिका, इजराइल और अन्य पश्चिमी देशों को शामिल नहीं किया गया था। इसके पीछे बात यह है कि ईरान ने कट्टरपंथियों द्वारा इस्लाम को कुचलने की कोशिश की और उसके लिए तीन बड़े कट्टरपंथी संगठनों की स्थापना की और उन्हें शक्ति चित्र बनाया। ये कई देशों की सत्ता के लिए बन गए खतरनाक। यह खतरनाक खतरा है कि जहां भी ईरान परमाणु हमले करता है तो एटम बम को महाविनाशक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो उसके गैर जिम्मेदाराना तरीकों से क्षुद्र सेवकों के लिए दुरूपयोग हो सकता है। यह बात पक्की नहीं है कि पाक के परमाणु कार्यक्रम और हथियार पूरी तरह से सुरक्षित हाथों में हैं। दूसरे अमेरिका और इजराइल ईरान को भी तहस-नहस कर दे रहे हैं कि वो परमाणु शक्ति का गलत इस्तेमाल न करने की साजिश नहीं दे रहे हैं। हालाँकि यह अमेरिका और इजराइल के अनमोल दादागिरी भी हैं।
वैसे ईरान और पाकिस्तान मुस्लिम देश होने के बाद भी डॉक्युमेंट में बहुत ज्यादा भाईचारा नहीं हो रहा है, क्योंकि ईरान शिया मुस्लिम बहुल देश और पाकिस्तान सुन्नी बहुल देश है। ईरान में सुन्नी और पाकिस्तान में शिया को अल्पसंख्यक घोषित और भेदभाव का शिकार बनाया जाता है। लेकिन अब अचानक पाकिस्तान और ईरान के बीच भाईचारा बढ़ गया है तो इसका कारण शेर का अंदेशा है। पाक नेताओं ने कहा कि ईरान हमारा मुस्लिम भाई है। इस युद्ध में हम उनकी 'पूरी तरह' मदद करेंगे। ताजा बवाल तब मचा जब सोशल मीडिया पर ईरानी सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी जनरल मोह रेजाई का बयान वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर इजरायल ने ईरान पर एटम बम डाला तो बदले में पाकिस्तान इजरायल पर परमाणु हमला कर देगा। इसके पहले इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 2011 में दिए गए एक साक्षात्कार में सार्वजनिक रूप से कहा था कि वो ईरान और पाकिस्तान के परमाणु बमों को टिकाऊ बनाकर रखेंगे। उन्होंने कहा कि हमारा सबसे बड़ा मिशन उग्रवादी इस्लामी शासन को परमाणु हथियार हासिल करना है। परमाणु हथियार इन शत्रु शासन के हाथों में नहीं जाना चाहिए। ईरान हो या फ़िर पाकिस्तान। इन कट्टरपंथियों के पास परमाणु हथियार होंगे तो डर है कि वो टुकड़े-टुकड़े किए गए अवशेषों का पालन नहीं करेंगे। जनरल रेज़ाई के बयान के बाद पाकिस्तान के हाथ-पैर फूल गए और उन्होंने विशेष रूप से कहा कि पाकिस्तान का एटम बम स्वदेश की रक्षा के लिए है, किसी और पर हमला नहीं किया गया है। हमने कभी भी इजराइल पर एटम बम बम धमाके की धमकी नहीं दी। पाकिस्तान के इस यू-टर्न के खिलाफ ईरान की 'हर तरह से मदद' के वादे पर विचार किया जा रहा है। यही नहीं उसने ईरान के साथ अपनी सीमा भी बंद कर दी है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि जनरल रेजाई का यह बयान कब का है।
वैसे ही पाकिस्तान फ़िलिस्तीनियों को अपने नैतिक समर्थन के साथ इज़राइल से दूरी बनानी है। उनका इजराइल के साथ प्रोटोटाइप भी नहीं हैं। फिलिस्तीनियों को भी पाकिस्तान का समर्थन मुख्य रूप से मिलता है, क्योंकि वे मुसलमान हैं। अब पाकिस्तान को डर है कि अगर ईरान एस्पोसोड खत्म हो गया तो आगे क्या होगा? ईरान-रूस-चीन की मदद के बावजूद इजराइल- अमेरिका का कब तक मुकाबला। संभव है कि ईरान या तो दबाव में अमेरिका के साथ परमाणु बम पर दस्तखत कर दे या फिर अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान में कट्टरपंथी खोमनेई सरकार का तख्तापलट कर दे। हालाँकि ये बहुत आसान नहीं है. यह बात असंवैधानिक है कि ईरानी जनता क्या चाहती है? संभव है कि तख्ता पलट के इस काम में अमेरिका-पाकिस्तान की मदद भी शामिल हो, जिससे मुकरना पाक के लिए निकलना बहुत मुश्किल है। अगर ईरान में अमेरिका के समर्थक जनरल बने तो निकटतम लक्ष्य पाकिस्तान ही होगा, जिसके पास परमाणु बम हैं और वो जब-तब भारत को अपना खतरा देता है। पाक के पास 170 परमाणु बम हैं, जबकि ईरान तो इसे बनाने की कोशिश में ही मारा गया है। हालांकि भारत ने भी 'आपरेशन सिन्दूर' को अंजाम देने वाले पाक को अपनी औकात बताई है। लेकिन खतरा यह भी है कि पाक का परमाणु कभी भी किसी वैज्ञानिक के हाथ में जा सकता है, जिसमें ईरान की तरह भी पाल रखा हुआ है। यह बात न तो इजराइल से है और न ही अमेरिका से। भारत तो दुनिया को ये बात शुरू से बतायी जा रही है।
इस बात की पूरी संभावना यह है कि ईरान प्रकरण नितांत ही अगले पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम हो। इसके लिए भूमिका बननी शुरू होगी। पाक के परमाणु कार्यक्रम को लेकर संदेहोंके कुछ ठोस कारण हैं। पहली तो पाकिस्तान में अवैध नागरिक सरकार है, जो फौजियों के दबाव में काम करती है और खुद फौजी आंतकियों को खुली आम प्रथा दे रही है। दूसरा, पाक ने 1968 के परमाणु प्रक्षेपण समझौते (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। यह संधि दुनिया के 191 देशों के दस्तखत पर है। भारत समेत 9 देशों ने दूरी बनाई इस आधार पर बनाया गया है कि यह भेदभाव, भेदभाव, पूर्णता और न्यायसंगत नहीं है। लेकिन भारत ने परमाणु के मामले में 'नो फ़र्स्ट यूज़' की घोषणा की है, जिसका अर्थ यह है कि भारत कभी भी युद्ध की स्थिति में पहले परमाणु बम का उपयोग नहीं करना चाहेगा। लेकिन परमाणु हमला हुआ तो उसी अंदाज में जवाब दिया गया। ऐसी ही घोषणा चन ने भी की है। लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया. यह उसकी गैर-जिम्मेदार परमाणु शक्ति की आपूर्ति करता है और इजराइल द्वारा इसकी आपूर्ति की जा सकती है।
अजय बोकिल, लेखक, संपादक











