भोपाल की सड़कों पर एक 'अदृश्य' अनुबंध, केवल दिखावा बनता कानून*

भोपाल की सड़कों पर एक 'अदृश्य' अनुबंध, केवल दिखावा बनता कानून*
- जब पिता नियम तोड़ना सिखाए, परिजन पुलिस से बचना सिखाये, नेता कानून से बचाए, पुलिस पैसे लेकर छोड़ दे, और नागरिक मौन रहें, तो हर ट्रैफिक सिग्नल पर मौत खड़ी मिलती है..

हर दिन भोपाल की सड़कों पर एक गुप्त लेकिन मानवता के लिए भयावह समझौता पूरी बेशर्मी से होता है। यह समझौता कागज पर नहीं, बल्कि राजधानी के चौराहों और सत्ता के गलियारों के बीच हुआ है। बीते वर्ष 2025 के आंकड़े और हालिया सड़क हादसों की भयावह तस्वीरें जो उभरती हैं, वह केवल खराब ट्रैफिक मैनेजमेंट की नहीं, बल्कि एक ऐसे 'लॉ-लेस-तंत्र' की हैं, जहाँ कानून का पालन करना एक विकल्प है, न कि अनिवार्यता।
हाल ही में घटी घटना ने शहर को झकझोर दिया है, जहाँ नशे में धुत एक कॉलेज छात्र ने रेलवे स्टेशन से लेकर मिनाल रेजीडेंसी तक 40 लोगों को टक्कर मारी। पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और 'वीआईपी कल्चर' के साये में पनपते ऐसे अपराधी यह दर्शाते हैं कि सड़क पर कानून का डर खत्म हो चुका है। जब ऐसे हादसों के बाद भी सिस्टम सजग नहीं होता, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून का अर्थ 'सुविधा' बन गया है, 'सुरक्षा' नहीं।
​यह अराजकता ऊपर से नहीं, बल्कि घरों के आंगन से शुरू होती है। पुलिस का मनोबल केवल सड़क पर नहीं टूटता; वह तब टूटता है जब एक जवान नियम तोड़ने वाले को रोकता है और उसे प्रभावशाली लोगों का संरक्षण मिलता है। जब एक नशे में धुत छात्र बेखौफ होकर शहर की सड़कों पर आतंक मचाता है, तो वह केवल कार नहीं चला रहा होता, वह समाज को यह संदेश दे रहा होता है कि वह अपने आपके को 'कानून से ऊपर' समझता है।
भोपाल की सड़कों पर दुर्घटनाओं के आंकड़े किसी युद्धक्षेत्र की रिपोर्ट की तरह दिखते हैं। वर्ष 2025 के आधिकारिक ट्रैफिक आंकड़े प्रशासन और नागरिक दोनों के लिए एक चेतावनी हैं। पिछले साल भोपाल में कुल 2,867 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 214 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और 2,163 लोग घायल हुए। ये आंकड़े केवल संख्याएं नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानी हैं जो एक छोटी सी लापरवाही या सिस्टम की विफलता के कारण उजड़ गए।
वहीं दूसरी ओर, पुलिस का चालानी तंत्र पूरी तरह से कैमरों और डिजिटल रिकॉर्ड पर सिमट कर रह गया है। 2025 में भोपाल में 18 लाख से अधिक ई-चालान जारी किए गए, जो यह दर्शाता है कि नियमों का उल्लंघन अब एक 'सामान्य प्रक्रिया' बन चुका है। चालान के यह आंकड़े साबित करते है कि कानून का भय खत्म हो चुका है; नागरिक 'जुर्माना' भरने को तैयार हैं, लेकिन नियमों का पालन करने के लिए नहीं।
यातायात विशेषज्ञों के अनुसार, भोपाल में एक नया सामाजिक प्रतिमान पैदा हुआ है। ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन अब 'अज्ञानता' नहीं, बल्कि 'स्मार्टनेस' का प्रतीक बन गया है। जब एक नशे में धुत वाहन चालक शहर के व्यस्त मार्गों पर घंटों तक लोगों को रौंदता है, तो यह केवल उसकी गलती नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की असफलता है जिसने उसे इतना दुस्साहसी बना दिया।
जब एक जवान चालान काटता है और तुरंत उसे 'ऊपर' से फोन आता है, तो सड़क पर मौजूद हर अन्य चालक यह समझ जाता है कि कानून सबके लिए समान नहीं है। 2025 में मिसरोद जैसे क्षेत्रों का 'ब्लैक स्पॉट' के रूप में उभरना यह बताता है कि हमने इंजीनियरिंग और सुरक्षा के बजाय केवल चालान काटने पर ध्यान केंद्रित किया है।
जब हम दुर्घटनाओं के बाद मौके पर मौजूद चश्मदीदों से बात करते हैं, तो प्रतिक्रिया लगभग एक जैसी होती है, "किस्मत खराब थी।" यह 'किस्मत' शब्द ही उस सामूहिक जिम्मेदारी से भागने का सबसे बड़ा ढाल है। कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि उस वाहन चालक को नशे में गाड़ी चलाने का साहस किसने दिया? और नागरिक क्यों नियमों के प्रति उदासीनता दिखाते हैं?
भोपाल एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ 'सिस्टम' का मतलब केवल सीसीटीवी कैमरे नहीं, बल्कि एक 'अनकहा समझौता' है। नागरिक नियमों को तोड़ते हैं, पुलिस चालान वसूली में मगशूल रहती है, और राजनेता अराजकता का संरक्षण करते हैं। यदि आप आज भोपाल की सड़क पर उतरें, तो आपको कहीं भी नियम लागू होते नहीं दिखेंगे। आपको केवल वे लोग दिखेंगे जो एक-दूसरे को 'पीछे छोड़ने' की होड़ में हैं।
सच्चाई यह है कि भोपाल को तकनीकी सुधारों की जरूरत नहीं है; इसे एक 'चेतना क्रांति' की आवश्यकता है। एक ऐसी क्रांति जो यह स्वीकार करे कि सड़क पर आपकी एक छोटी सी चूक केवल एक उल्लंघन नहीं, बल्कि एक सामाजिक हत्या है।
अंत में, सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कितने ई-चालान काटे या कितने कैमरे लगाए हैं। सवाल यह है कि क्या भोपाल का नागरिक खुद को कानून के अधीन देखना चाहता है? या फिर, क्या वह 'लॉ-लेस-तंत्र' के इस आरामदायक अंधेरे में ही रहने का आदी हो चुका है? भोपाल अभी भी उस मोड़ पर है, जहाँ से वापसी का रास्ता केवल एक ही है, कानून का बिना भेदभाव लागू होना और नागरिक का बिना शर्त पालन करना। बाकी सब केवल शोर है।

- राजकुमार जैन, यातायात प्रबंधन विशेषज्ञ
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