जातीय जनगणना पर हेमंत सोरेन क्यों हिचक रहे, वजह ऐसी की जान कर हैरान रह जाएंगे

जातीय जनगणना पर हेमंत सोरेन क्यों हिचक रहे, वजह ऐसी की जान कर हैरान रह जाएंगे
रांची: बिहार में भारी शोरशराबे और आपत्ति-विरोध के बीच जाति गणना हो गई। ओडिशा सरकार ने बिना किसी शोरशराबे के जाति गणना करा ली। अब झारखंड में भी इसकी मांग हो रही है। बीजेपी भले इस पर अभी कुछ नहीं बोल रही, लेकिन बाकी पार्टियां इसकी मांग कर रही हैं। सीएम हेमंत सोरेन खुल कर इस मांग पर नहीं बोलते, लेकिन जाति गणना की मांग को खारिज भी नहीं करते। वे तर्क देते हैं कि वर्ष 2021 में ही उन्होंने जातिगत आरक्षण का प्रस्ताव विधानसभा से पास करा राज्यपाल को भेज दिया था। यानी वे बात को घुमा देते हैं। हेमंत सोरेन को जाति गणना कराने में कहां दिक्कत है, यह जानना जरूरी है। दरअसल झारखंड की पहचान आदिवासी बहुल राज्य के रूप में होती रही है। आदिवासियत की राजनीति झारखंड की तकरीबन सभी पार्टियां करती हैं। अगर ऐसे दल जाति गणना पर खुल कर नहीं बोलते तो इसके कारण भी हैं। अब तक यही बात कही जाती रही है कि झारखंड की कुल आबादी में आदिवासी महज 26 प्रतिशत हैं। ओबीसी की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में झारखंड में अगर जाति गणना हुई तो उसके आंकड़े आदिवासियों की राजनीति करने वाले दलों के मुसीबत खड़ी कर देंगे। शायद यही वजह रही कि चार साल से अधिक के अपने कार्यकाल में हेमंत सोरेन के दिमाग में यह बात नहीं आई।

ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों की बड़ी संख्या

झारखंड की आदिवासी आबादी में खासा तादाद ईसाइयों की है। आदिवासी से ईसाई धर्म अपनाने वाले लोग पहले से ही दोहरा लाभ लेते रहे हैं। वे ईसाइयों के साथ आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ भी लेते रहे हैं। अगर ठीक से गणना हो तो आदिवासी समाज से ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों की संख्या अलग हो जाएगी। ऐसे में विशुद्ध आदिवासी आबादी की संख्या घट जाएगी। ओबीसी में बहुलता कुर्मी बिरादरी की है। वे अर्से से आदिवासी जमात में खुद को शामिल करने की मांग करते रहे हैं। इसके लिए कई बार रेल अवरोध भी किया गया। खैर, जब तक इस बाबत कोई निर्णय नहीं हो जाता, कुर्मी ओबीसी में ही गिने जाएंगे।

जाति गणना से मुस्लिम आबादी का आएगा बड़ा डेटा

जाति गणना होने पर मुस्लिम आबादी के असली आंकड़े सामने आ जाएंगे। झारखंड के कई जिलों में मुसलमानों की आबादी बेतहाशा बढ़ी है। संताल परगना के सीमावर्ती जिलों में तो कई स्थानों पर अल्पसंख्यक मुसलमान ही बहुसंख्यक हो गई है। भाजपा इसे लेकर अक्सर सवाल भी उठाती रहती है। घुसपैठ कर अवैध ढंग से झारखंड में आए मुस्लिम तबके के काफी लोग अब यहां के निवासी भी अपने को बताने लगे हैं। आदिवासी लड़कियों से शादी, रेप और हत्या के कुछ मामले भी सामने आए हैं, जिन्हें भाजपा आदिवासी समाज पर जुल्म मानती है और इन्हें राज्य सरकार द्वारा संरक्षण देने का आरोप लगाती है।

आदिवासी समाज की राजनीति करने वाले फंसेंगे

ऐसे में अगर झारखंड में जाति गणना होती है तो आदिवासी समाज की राजनीति करने वालों पर शामत आ जाएगी। आदिवासियों के लिए बनने वाली सरकारी योजनाओं में कटौती भले न हो, लेकिन सवाल तो उठेंगे ही कि ओबीसी की आबादी अगर अधिक है तो उन्हें क्यों नहीं आदिवासियों की तरह या उनसे अधिक लाभ मिले। इसलिए कि विपक्षी दलों ने हाल के दिनों में एक नारा दिया है- जिसकी जितनी आबादी, उसको उतनी ही हिस्सेदारी। यही फार्मूला सत्ताधारी दलों को जाति गणना कराने से पहले सोचने पर विवश कर रहा है।

बिहार जैसे बवाल से बचना तो नहीं चाहते हेमंत

झाऱखंड सरकार को भय है कि जाति गणना कराने पर बिहार की तरह बवाल संभव है। जिस तरह महागठबंधन के नेता बिहार में आपस में ही बंट गए हैं और ईबीसी की अधिक आबादी देख कर उन्हें सीएम बनाने या उसी हिसाब से मंत्रिमंडल गठन की मांग हो रही है, ऐसी स्थिति झारखंड सरकार के सामने भी आ सकती है। जब आबादी के हिसाब से कुर्मी सत्ता में प्रतिनिधित्व की मांग करेंगे, आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए आवाज उठाएंगे, जाहिर है कि मुस्लिम भी उसी तरह की मांग करने लगें।

जाति गणना पर हेमंत सोरेन का घुमावदार जवाब

जाति गणना की मांग पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि यह तो उनकी पार्टी की पुरानी मांग है। उनकी सरकार का स्पष्ट मानना है कि जो जिस समूह में जितनी संख्या में हैं, उसको उतना अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन झारखंड में जाति गणना होगी कि नहीं या कब होगी, जैसे सवाल पर वे गोलमटोल जवाब देते हैं कि जातिगत जनगणना को लेकर 2021 से ही उनकी सरकार प्रयास कर रही है। राज्यपाल को विधानसभा से पारित कर आरक्षण से संबंधित विधेयक 2021 में ही भेजा गया। पर, हेमंत इस बात का स्पष्ट जवाब नहीं देते कि जाति गणना वे भी कराएंगे।

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