शादी बिवाह के लिये क्यो आवश्यक है वर वधु कुंडली मिलान

शादी बिवाह के लिये क्यो आवश्यक  है  वर  वधु  कुंडली  मिलान
कुंडली मिलान के माध्यम से वर-वधु की कुंडलियों का आंकलन किया जाता है ताकि वह जीवनभर एक-दूसरे के पूरक बने रहें I कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ I  सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढ़ना चाहिए I आज चर्चा करते है वर -वधु कुंडली मे कुण्डली मिलान में दोष परिहार कि,  किन कारणों से आपकी कुण्डली के दोष खत्म होते हैं I

शादी के लिये वर -वधु   कुंडली मिलान में  **गण दोष**  व उसका  का परिहार : 
यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें : चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है I
ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है I यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है I

शादी के लिये वर -वधु कुंडली मिलान में षडाष्टक (भृकुट  दोष  ) योग व उसका परिहार  : यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक,  वृष/तुला,  मिथुन/मकर,  कर्क/धनु,  सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं I मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है I
यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए I
मेष/कन्या,  वृष/धनु,  मिथुन/वृश्चिक,  कर्क/कुंभ,  सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए I
यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है I

शादी के लिये वर -वधु  कुंडली मिलान में नव पंचम का का दोष व इस दोष का परिहार :   जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है I

नव पंचम का परिहार ;-  यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है I मीन/कर्क,  वृश्चिक/कर्क,  मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए I यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशि  या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है I

पंडित मनोज दीक्षित, ज्योतिषाचार्य
      
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