मानव जीवन का यह सत्य है कि उसकी मौत निश्चित है लेकिन हम इस सत्य को समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे कि जितना जीवन जीने का समय (उम्र) है उसे किस प्रकार से जिना चाहिए, कैसे जिए , क्यों हम (मानव जाती) गेर जरूरी विकास की ओर बढ़ रहे है क्यों हम प्रकृति से छेड़छाड़ कर रहे हैं आप नतीजा देख लीजिए छोटी बरसात में भी बाढ़ आने लगी, यह सिर्फ हमारे देश में ही हो रहा है बल्कि विकसित देशों में भी हो रहा है। बाढ़ भूकंप बदलता मौसम आंधी तूफान बवंडर यह सब प्रकृति के साथ छेड़छाड़ होने से बढ़ रहे हैं। भूस्खलन जब जब भी प्रकृति से छेड़छाड़ होगी यह आपदाएं हमें भुगतना ही पड़ेगी। क्या सोचकर मिसाइल, फाइटर जेट प्लेन बनाए क्या सोचकर ड्रोन बनाएं क्या सोचकर कंप्यूटर युग लाये आप एक जगह बैठे बैठे हजारों मील दूर किसी को भी तबाह कर दो। विश्वभर में बेचैनी फैली है रूस यूक्रेन अफ़ग़ानिस्तान तालिबान भारत पाकिस्तान चिन वियतनाम अमेरिका इराक इसराइल सीरिया गाजा और भी कई देश युद्ध झेल चुके हैं। जिन्होने बड़े-बड़े डैम बनाएं और एक दिन वही विनाश का कारण रहेंगे। तबाही इंसान ने दूसरे तरीके से भी पैदा कर रखी है पूरे विश्व में क्रिश्चियन और मुस्लिम अपनी आबादी बढ़ाने में लगे हैं धर्मांतरण का जोर पूरे विश्व में फैला रखा है। ये सब बेचैन आत्माऐ ना तो खुद अच्छे से जी रही है और न आम जनता को जीने दे रही।
आप मेरी बात पर गौर करे हमारी जिंदगी लिमिटेड समय की है उसे शांति और सुकून से जीने की कोशिश करें, यह जो हथियारों का निर्माण और बड़े-बड़े शहर बसाने का जो विकास का ग्लैमर है वही विनाश का कारण है। कृत्रिम वर्षा करना यह भी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ है हां अगर विकास ही करना है तो शांति सद्भाव मैत्रि और त्याग भावना का करो।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक पत्रकार पर्यावरणविद्)











