सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, दुर्लभ पृथ्वी तत्व, जैसे लैंटानम, नियोडिमियम और टेरबियम पृथ्वी को गर्म करने वाले जीवाश्म ईंधन के साथ अपने लंबे, विनाशकारी संबंध को तोड़ने में दुनिया की मदद करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि इस मैटेरियल को निकालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि ये अक्सर कम सांद्रता में पाई जाती हैं।
बीते साल की जांच ने वैज्ञानिकों को किया प्रेरित
एनेनबर्ग ने कहा कि हमने कभी किसी सक्रिय ज्वालामुखी से लौह-समृद्ध मैग्मा को फटते नहीं देखा है। इसके बावजूद हम जानते हैं कि कुछ विलुप्त ज्वालामुखी में इस तरह का रहस्यमय विस्फोट हुआ था। ऐसे में इसलिए वैज्ञानिकों ने इन विलुप्त ज्वालामुखियों से समान संरचना वाली सिंथेटिक चट्टान का उपयोग करके अपनी प्रयोगशाला में मैग्मा की जांच की।
रिसर्च कहती है कि एक बार जब चट्टान पिघल गई और 'मैग्मैटिक' बन गई, तो लौह-समृद्ध मैग्मा ने अपने पास के दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को अवशोषित कर लिया। इससे निष्कर्ष निकला कि यह लौह-समृद्ध मैग्मा नियमित ज्वालामुखियों से निकलने वाले मैग्मा की तुलना में दुर्लभ पृथ्वी को केंद्रित करने में 200 गुना बेहतर था। अध्ययन में उम्मीद जताई गई है कि अमेरिका, चिली और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनियाभर में विलुप्त ज्वालामुखियों में ये भंडार हो सकते हैं।
दुनिया के कई हिस्सों में हो सकता है भंडार
एनेनबर्ग ने कहा कि इनमें से कई साइटों पर पहले से ही लौह-अयस्क के लिए खनन किया जा रहा है। यह कंपनियों और पर्यावरण के लिए जीत की तरह है। व्रीजे यूनिवर्सिटी एम्स्टर्डम में प्रोफेसर लिंगली झोउ का मानना है कि यह अध्ययन क्षेत्र के भूवैज्ञानिकों के लिए मूल्यवान जानकारी देगा। उन्हें समृद्ध, आर्थिक रूप से व्यवहार्य खोज में मदद मिलेगी, जो दुर्लभ पृथ्वी आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने में मदद कर सकती है।











