क्या है मुलायम का वो किस्सा?
बात 1999 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद को लेकर होने वाली दावेदारी की है। अटल बिहारी वाजपेय सरकार ने 13 माह पूरे किए थे। 14 अप्रैल 1999 को एआईएडीएमके ने एनडीए से बाहर जाने का फैसला किया। इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने अटल सरकार को तीन दिन में बहुमत साबित करने को कहा। अटल सरकार एक वोट से गिर गई। इसके बाद सोनिया गांधी ने 272 सांसदों का समर्थन का दावा किया। इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अंदरखाने से अलग राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू की। सोनिया सरकार न बनने देने के लिए जया जेटली के घर पर लालकृष्ण आडवाणी और मुलायम की मुलाकात हुई। सूत्रधार तत्कालीन एनडीए संयोजक जॉर्ज फर्नांडीस बने।
मुलायम ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाते हुए अपने 20 सांसदों का समर्थन यूपीए को न देने का ऐलान कर दिया। बाद में शरद पवार भी कांग्रेस से बाहर निकल गए। इस घटना के बाद सोनिया सरकार नहीं बन पाई। देश में दोबारा चुनाव हुए और अटल सरकार दोबारा सत्ता में लौटी। मुलायम जमाने की करवाहट कांग्रेस आज तक नहीं भूल पाई है। ऐसे में सपा को मजबूत गढ़ में एंट्री करने से रोकने की कोशिश में पार्टी है।
मुलायम ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाते हुए अपने 20 सांसदों का समर्थन यूपीए को न देने का ऐलान कर दिया। बाद में शरद पवार भी कांग्रेस से बाहर निकल गए। इस घटना के बाद सोनिया सरकार नहीं बन पाई। देश में दोबारा चुनाव हुए और अटल सरकार दोबारा सत्ता में लौटी। मुलायम जमाने की करवाहट कांग्रेस आज तक नहीं भूल पाई है। ऐसे में सपा को मजबूत गढ़ में एंट्री करने से रोकने की कोशिश में पार्टी है।
अखिलेश के लिए स्थिति मुश्किल
मुलायम जमाने की करवाहट की फसल अब अखिलेश यादव काटते दिख रहे हैं। कांग्रेस भले ही यूपी में पिछले डेढ़ दशक से कोई वैसी राजनीतिक ताकत दिखाने में कामयाब नहीं रही हो, लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय सीधे अखिलेश यादव को आंख दिखा रहे हैं। वे बयानों में लगातार सपा अध्यक्ष को निशाने पर रखे हैं। कांग्रेस कथित तौर पर सपा से नाराज मुस्लिम वोट बैंक को साधने में जुटी है। पश्चिमी यूपी में इमरान मसूद जैसे नेताओं की वापसी और आजम खान के प्रति प्रेम का इजहार कर कांग्रेस ने अलग संकेत दिए हैं। इस प्रकार की स्थिति में समाजवादी पार्टी को भाजपा की चुनौती के साथ-साथ अपने पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक समीकरण को सही मायने में चुनावी मैदान में उतारने की चुनौती हो गई है।











