विलुप्त होती जा रही त्योहारों पर अपनी भाषा में शुभकामनाएँ देने की भारतीय परंपरा

विलुप्त होती जा रही त्योहारों पर अपनी भाषा में शुभकामनाएँ देने की भारतीय परंपरा
भारत त्योहारों की धरती है—जहाँ हर ऋतु, हर माह, हर अवसर किसी न किसी उत्सव की छटा बिखेरता है। दीपावली हो या दशहरा, गणेशोत्सव हो या होली—इन पर्वों की आत्मा केवल दीपों, रंगों और पकवानों में ही नहीं, बल्कि उन शुभकामनाओं में भी रची-बसी है, जिन्हें हम दिल से एक-दूसरे को अर्पित करते आए हैं।
कभी इंदौर की गलियों में दीपावली की रात लोग घर-घर जाकर कहते थे—“शुभ दीपावली”। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि लोकमंगल की कामना थी। बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना, बच्चों का उत्साह से प्रसाद बाँटना, मित्रों को गले लगाकर स्नेहिल शब्दों में त्योहार की बधाई देना—यही हमारी असली पहचान थी।
किन्तु आज दृश्य बदल रहा है। मोबाइल स्क्रीन पर चमकते संदेशों में अब “Happy Diwali” लिखा दिखता है। विद्यालयों में बच्चों को सिखाया जाता है—“Shake hand and say Happy Diwali.” शुभकामना का यह आत्मीय भाव धीरे-धीरे एक यांत्रिक अंग्रेज़ी वाक्य में सिमटता जा रहा है।
वास्तव में प्रश्न यह नहीं कि अंग्रेज़ी बुरी है या अच्छी। प्रश्न यह है कि जब हमारी भाषा में “शुभ” जैसा व्यापक, मंगलकारी और लोकहितकारी शब्द विद्यमान है तो हम क्यों उसे छोड़कर “Happy” जैसे निजी भाव तक सीमित शब्द को अपनाएँ? दीपावली व्यक्तिगत खुशी का नहीं, बल्कि सामूहिक उल्लास और लोककल्याण का पर्व है। इसलिए “शुभ दीपावली” कहना कहीं अधिक सजीव और अर्थपूर्ण है।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 44% से अधिक जनसंख्या हिंदी भाषी है, जबकि अंग्रेज़ी को मातृभाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या लाखों में भी नहीं पहुँचती। यह आँकड़े बताते हैं कि आज भी भारत की आत्मा अपनी भाषाओं में धड़कती है। फिर क्यों हम स्वयं अपनी भाषा से विमुख होकर अपने ही सांस्कृतिक अस्तित्व को कमजोर करें?
त्योहार केवल पूजा-अर्चना या अनुष्ठान नहीं होते; वे हमारी सांस्कृतिक निरंतरता, भावनात्मक जुड़ाव और पीढ़ियों के बीच संवाद का सेतु होते हैं। जब हम बच्चों से कहते हैं—“बेटा, बड़ों को नमस्ते करो और शुभ दीपावली बोलो”—तो हम केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि अपनी पूरी सभ्यता आगे बढ़ा रहे होते हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में यह और भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि उपभोक्तावाद और आभासी जीवनशैली त्योहारों को केवल खरीदारी और सजावट तक सीमित कर रही है। ऐसे समय में हमारी भाषाई परंपरा ही त्योहारों की आत्मा को जीवित रख सकती है।
स्मरण रहे, जब हम “शुभ दीपावली” कहते हैं तो उसमें पड़ोसी की समृद्धि, मित्र की सफलता, किसान की अच्छी फसल और समाज की उन्नति—all inclusive—भाव समाहित होते हैं। वहीं “Happy Diwali” केवल निजी खुशी तक सिमटी एक शुभेच्छा है।
अतः यह कोई भाषाई जिद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दायित्व है कि हम अपने त्योहारों को अपनी ही भाषा में मनाएँ। अंग्रेज़ी के प्रयोग का विरोध नहीं, परंतु अपनी भाषा के प्रति सम्मान और आत्मीयता का आग्रह अवश्य है।
आइए, इस दीपावली हम सब प्रण लें कि—
👉 सोशल मीडिया पर संदेश भेजते समय “शुभ दीपावली” ही लिखेंगे।
👉 अपने बच्चों को हाथ जोड़कर नमस्ते करना और अपनी भाषा में बधाई देना सिखाएँगे।
👉 आधुनिकता की आड़ में अपनी परंपरा को विस्मृत नहीं होने देंगे।
अंततः, यह निर्णय हर व्यक्ति का है कि वह “Happy Diwali” कहे या “शुभ दीपावली”। पर स्मरण रहे—शुभ केवल शब्द नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा है, और जब “शुभ” होगा, तो “Happy” तो स्वयं ही हो जाएगा।
✨ “भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, संस्कृति का प्राण है। दीपावली के दीप केवल घर नहीं, हमारी जड़ों को भी आलोकित करें।”
- राजकुमार जैन, स्वतंत्र लेखक
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