18 साल की उम्र में सिर से उठा पिता का साया, सपनों को मार उठानी पड़ी स्टेयरिंग
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के पूरे धींगई गांव में जन्मे सलमान खान का बचपन कभी आसान नहीं रहा। छह भाई-बहनों में सबसे बड़े सलमान के पिता मोहम्मद कासिम खान हरियाणा के ताउरू में ट्रक की बॉडी बनाने का काम करते थे। सलमान का सपना बचपन से ही भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब सलमान महज 18 साल के थे, तब डेंगू के कारण उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। रातों-रात पूरे परिवार के राशन और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी 18 साल के सलमान के नाजुक कंधों पर आ गिरी। फौज में भर्ती होने के अपने सपने को दिल में दफन कर सलमान काम की तलाश में दिल्ली आ गए। परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने दिन-रात दिल्ली की चिलचिलाती धूप और कड़ाके की ठंड में कैब चलाना शुरू कर दिया।किस्मत ने बदली करवट, कैब ड्राइवर से नायब सूबेदार तक का सफर
सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाते हुए भी सलमान की आंखों में फौज की वर्दी का सपना मरा नहीं था। एक दोस्त ने उनकी अच्छी लंबाई और फौलादी काठी को देखकर उन्हें दोबारा आर्मी भर्ती में किस्मत आजमाने की सलाह दी। सलमान ने कैब की चाबी दूसरे ड्राइवर को सौंपी और केवल 4 महीने की दिन-रात की जी-तोड़ मेहनत के बाद 25 सितंबर 2018 को बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप, पुणे में भारतीय सेना में शामिल हो गए।फौज में आने के बाद कोचों ने उनके लंबे कद को देखकर उन्हें रोइंग में उतरने को कहा। जिस खेल का नाम तक सलमान ने कभी नहीं सुना था, उसमें नाव संभालना उनके लिए बेहद कठिन था। दो बार उनका हौसला इस कदर टूटा कि वे खेल छोड़ना चाहते थे, लेकिन आर्मी के सीनियर कोचों ने उनका हाथ थामे रखा। सलमान की मेहनत रंग लाई और वे नेशनल गेम्स से लेकर एशियन रोइंग कप में गोल्ड मेडल जीतते चले गए। उनके इस ऐतिहासिक प्रदर्शन की बदौलत भारतीय सेना ने उन्हें 'नायब सूबेदार' के पद पर पदोन्नत किया।
