अधीनस्थ (लोअर) कोर्ट - हाई कोर्ट - सुप्रीम कोर्ट, यहां जो भी न्यायाधीश नियुक्त होते हैं वह सब काफी पढ़े-लिखे तजुर्बेदार और कानून के अच्छी तरह जानकार होते हैं। जब भी कोई विवाद होता है तो सभी कहते हैं कि " I will see you in Court" "मैं तुझे कोर्ट में देखूंगा ", और वह यह सब इसी उम्मीद में कहता है कि उसे न्याय मिलेगा। यह बात अलग है कि किस्मत वालों को न्याय जल्दी मिल जाता है वरना 20 साल 40 साल 50 साल कई बात व्यक्ति जिंदा ही नहीं रहता। परंतु आश्चर्य तब होता है कि एक कोर्ट यदि किसी को सजा देती है यहां तक कि उसे फांसी की भी सजा होती है उसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से बरी कर दिया जाता है। अभी हाल ही में मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में सजा व फांसी के दोषी 12 मुजरीम निर्दोष साबित होते हैं कुल मिलाकर 19 साल का समय गुजर गया। यह बहुत गंभीर मसला है जिसे समझना बहुत भारी पड़ रहा है, कोई एक कोर्ट के फैसले को दूसरी कोर्ट बिल्कुल ही विपरीत फैसला दे तो इसका मतलब है कि दोनों न्यायाधीशों में से कोई एक गलत है यानी उन्होंने उचित न्याय नहीं किया और न्यायाधीश पर उंगली उठाना हमे कतई स्वीकार नहीं है। फैसले में पुलिस व अन्य जांच एजेंसी की डॉक्यूमेंट्री प्रूफ का महत्वपूर्ण रोल होता है जिससे सजा निर्धारित होती है लेकिन हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट मैं अपील करने पर कभी कभी इसी जजमेंट को अमान्य करते हुए पूरा फैसला ही बदलता है। हम उम्मीद करें भविष्य में ये मसला राष्ट्रपति को देखना होगा वही न्यायाधीशों को निर्देशित करें कि इस प्रकार से अलग-अलग जजमेंट नहीं होना चाहिए।
-अशोक मेहता इंदौर (इंजीनियर लेखक पर्यावरणविद्) (ये लेखक के अपने विचार है )











