त्रेतायुग के राम और कलियुग का रावण

त्रेतायुग के राम और कलियुग का रावण
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में विजयादशमी केवल एक धार्मिक उत्सव का नाम भर नहीं है। यह पर्व भारतीय आत्मा का जीवंत घोष है, जो हमें बार-बार स्मरण कराता है कि सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, मर्यादा और अहंकार के बीच संघर्ष निरंतर है। समय बदलता है, युग बदलते हैं, किंतु यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। हर युग में रावण नए-नए रूपों में जन्म लेता है और हर युग में राम के आदर्श ही उसके विनाश का मार्ग प्रशस्त करते हैं। विजयादशमी हमें आगाह करती है कि अधर्म चाहे कितनी ही शक्तियां क्यों न बटोर ले, उसका अंत निश्चित है और धर्म की विजय एक अटल सत्य है।

त्रेतायुग में रावण सोने की लंका का राजा था। वह कालजयी विद्वान, महापंडित और शिवभक्त था, परंतु अहंकार ने उसे अधर्म की ओर धकेल दिया। जिसके चलते उसकी शक्ति, उसका ज्ञान और उसका वैभव, सब उसके पतन का कारण बन गए। अंततः भगवान श्रीराम ने उसके अहंकार का अंत किया और संसार को यह संदेश दिया कि कोई व्यक्ति चाहे कितना ही महान क्यों न हो, यदि वह मर्यादा और धर्म से विमुख होगा तो उसका विनाश अवश्यंभावी है।

त्रेता युग में राम के बाणों से रावण का शारीरिक अंत तो प्रतीतात्मक था , उस युद्ध का असली संदेश यह था कि मनुष्य के भीतर छिपे लोभ, अहंकार और वासना रूपी रावण ही सबसे खतरनाक हैं। आज के कलियुग का रावण हमारे सामने सोने की लंका के राजा के रूप में नहीं खड़ा है। वह न तो दस सिरों वाला कोई राक्षस है और न ही कोई परलोक का दैत्य। वह तो हमारे मन के भीतर छिपा बैठा है। आज का रावण है,  राजनीति में भ्रष्ट आचरण और सत्ता की भूख,  व्यापार और उद्योग में छल, शोषण और अनैतिक प्रतिस्पर्धा,  शिक्षा के मंदिरों में मूल्यों का पतन और केवल अंकों की दौड़,  युवाओं के जीवन में व्यसन, नशा और आभासी लत,  समाज में दिखावे का मोह और नैतिकता का क्षय। आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग, सोशल मीडिया पर आडंबर और त्वरित सफलता की अंधी चाह ही इस कलियुगी रावण के नए चेहरे हैं।

त्रेतायुग में रावण से लोग भयभीत थे, पर आज की विडंबना यह है कि लोग स्वयं इस कलियुगी रावण की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ईमानदारी, परिश्रम और तपस्या उन्हें बीते जमाने की बातें लगने लगी हैं। दिखावे की चमक और रातोंरात अमीर बनने की चाह इतनी तीव्र हो गई है कि जीवन के स्थायी मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। हमारे बच्चों और युवाओं के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है। यदि वे आभासी चमक-दमक और त्वरित सुख के पीछे भागेंगे तो रावण उनके मन पर हावी हो जाएगा। पर यदि वे शिक्षा, सेवा और सत्य का मार्ग चुनेंगे तो वे स्वयं रामस्वरूप बनकर समाज और राष्ट्र को नई दिशा देंगे।

राम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं थे। वे मर्यादा, अनुशासन, करुणा और सत्य के प्रतीक हैं। उनका मार्ग कठिन प्रतीत होता है, पर वही स्थायी सुख और सम्मान का मार्ग है। रावण का मार्ग आकर्षक और सरल दिखता है, किंतु उसका अंत शून्यता और विनाश में होता है। राम ने सिखाया कि सच्ची सफलता धन और यश की क्षणभंगुर चमक में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और समाज की उन्नति में है। रामचरितमानस कहती है। “कर्म प्रधान विश्व करि राखा ।  जो जस करहि सो तस फल चाखा ॥” यह कथन त्रेतायुग में भी शाश्वत सत्य था और आज के कलियुग में भी उतना ही प्रासंगिक है।

आज के युग की सबसे बड़ी शक्ति एआई जैसी तकनीक है। यह वरदान भी है और अभिशाप भी। यदि तकनीक का उपयोग भोग, दिखावे और छल में होगा तो यह विनाश लाएगी। लेकिन यदि इसका प्रयोग सेवा, सृजन और समाज के उत्थान में होगा तो यह अमरत्व प्रदान करेगी। राम का आदर्श यही सिखाता है कि हर शक्ति का उपयोग मर्यादा और धर्म के लिए होना चाहिए, अन्यथा वही शक्ति रावण का रूप ले लेती है।

विजयादशमी केवल पुतले जलाने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन और आत्मदाह का संकल्प लेने का पर्व है। असली युद्ध बाहर नहीं, भीतर है। जब तक हम अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मोह रूपी रावण पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक पुतले जलाना मात्र औपचारिकता रहेगा। प्रत्येक व्यक्ति को यह संकल्प लेना होगा कि वह अपने भीतर के अंधकार को मिटाएगा। तभी विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा।

विजयादशमी पर युवाओ से आव्हान है कि राम बनो, रावण नहीं। आज की युवा पीढ़ी के सामने दो विकल्प हैं, राम का बताया शिक्षा, सत्य, सेवा और मर्यादा का मार्ग या रावण के जीवन से प्रेरित आलस्य, नशा, आभासी चमक और त्वरित सुख का मार्ग। युवा रावण के पीछे भागेंगे तो वे स्वयं के जीवन को खो देंगे और समाज को अंधकार की ओर धकेलेंगे। लेकिन यदि वे राम के आदर्शों को अपनाएँगे तो वे राष्ट्र की दिशा बदल देंगे और समाज में नई रोशनी जगाएँगे।

सत्य अमर है, मर्यादा कालजयी है और रावण क्षणभंगुर। यही विजयादशमी का उद्घोष है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि रावण चाहे किसी भी रूप में जन्म ले, उसका अंत निश्चित है। धर्म की ज्योति कभी बुझती नहीं और सत्य की विजय निश्चित है। विजयादशमी का असली संदेश यही है कि हम अपने भीतर के रावण को पहचानें और उसका दहन करें। तभी यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण का संकल्प बनेगा।

✍️ राजकुमार जैन, स्वतंत्र लेखक

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