बांग्लादेश के मानवाधिकार संगठन 'ओधिकार' (Odhikar) ने देशभर में हिंसा को लेकर दस्तावेज तैयार किया है। इसमें बताया है कि 9 अगस्त से 30 सितम्बर के बीच कम से कम 8 लोग न्यायेतर (कानून से परे जाकर) हत्याओं का शिकार हुए। न्यायेतर हत्याएं वे हैं, जिन्हें राज्य के एजेंट या उसके समर्थन से बिना किसी न्यायिक कार्यवाही को पूरा किए अंजाम दिया जाता है।
मोहम्मद यूनुस के बांग्लादेश में पुलिस और एजेंसियां बनी किलिंग मशीन, पहले 52 दिनों में मारे गए कितने लोग, आ गई लिस्ट
ढाका: बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में सत्ता संभालने के बाद मोहम्मद यूनुस ने वादा किया था कि वह देश में अल्पसंख्यकों और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हो रही हिंसा को रोकेंगे। लेकिन देश से आ रहे आंकड़े बताते हैं कि मोहम्मद यूनुस के पदभार संभालने के बाद भी विरोधियों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं लगातार जारी हैं। बांग्लादेश के मानवाधिकार संगठन ने ही मोहम्मद यूनुस सरकार की पोल खोल दी है।
सरकारी एजेंसियों की यातना में मारे गए लोग
ओधिकार ने जुलाई से सितम्बर के लिए तीन महीनों की यह रिपोर्ट अपने साथ जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों और न्यूज आउटलेट में प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर तैयार की है। इन आठ पीड़ितों में से एक की मौत कथित तौर पर पुलिस की यातना के कारण हुई, दूसरे की मौत मादक पदार्थ नियंत्रण विभाग के हाथों और तीन की मौत कथित तौर पर संयुक्त बलों की यातना के चलते हुई। इसके अलावा, तीन लोगों की संयुक्त बलों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
राजनीतिक हिंसा में 52 लोगों की मौत
रिपोर्ट में कहा गया है कि 9 अगस्त से 30 सितंबर के बीच राजनीतिक हिंसा में कम से कम 52 लोग मारे गए और 1,308 लोग घायल हुए। जुलाई और सितंबर के बीच कुल 67 लोगों की हत्या की गई। इनमें से 36 लोगों की 1 जुलाई से 5 अगस्त के बीच और 31 की 9 अगस्त से 30 सितंबर के बीच हत्या कर दी गई। हालांकि, 9 अगस्त से 30 सितंबर के बीच कथित तौर पर जबरन गायब किए जाने का कोई मामला सामने नहीं आया।
ओधिकार के आंकड़ों के अनुसार, 9 अगस्त से 30 सितंबर के बीच अपनाम काम करते हुए चार पत्रकार घायल हुए, दो पर हमला किया गया, तीन को धमकाया गया, तीन के खिलाफ मामले दर्ज किए गए। छात्रों के नेतृत्व में 1 जुलाई से 5 अगस्त के बीच हुए जनांदोलन के दौरान बच्चों सहित 1,581 लोग मारे गए और 18,000 से अधिक लोग घायल हुए। इसमें भेदभाव के खिलाफ छात्र आंदोलन और जातीय नागरिक समिति के आंकड़े शामिल हैं।











