सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर, 1960 को सिंधु प्रणाली की नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर हस्ताक्षर किए गए थे। बीते साल पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित कर दिया। भारत ने इस कदम के पीछे का मकसद पाकिस्तान के आतंक को समर्थन देना कहा है।
भारत को कदम उठाने का अधिकार
सामुदायिक जल अधिकार और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने की जरूरत विषय पर आयोजित कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ब्रुसेल्स स्थित साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के रिसर्च डायरेक्टर सीगफ्राइड वुल्फ ने कहा कि भारत को 1960 की संधि की समीक्षा की मांग करने का पूरा अधिकार है। ये जायज है क्योंकि पाकिस्तान के व्यवहार ने संधि की प्रस्तावना में बताए गए समझौते के मकसद, उद्देश्य और भावना को कमजोर किया है।वुल्फ ने इस संधि को भारत की तरफ से दी गई एक स्वैच्छिक रियायत बताया जो एक संरचनात्मक असंतुलन पर आधारित थी। पानी के बंटवारे में 80:20 का अनुपात, सिंधु विकास कोष में वित्तीय योगदान, भंडारण और बुनियादी ढांचे की सीमाएं (टैक्टिकल लीगल वॉरफेयर) के तहत बगलीहार, किशनगंगा और रातले जैसी भारतीय परियोजनाओं को बार-बार चुनौती दी गई।
भारत के कदम एकदम सही
डॉक्टर वुल्फ ने पाकिस्तान के उस दावे को इंजीनियरिंग मिथक (तकनीकी गलतफहमी) करार दिया, जिसमें उसने कहा है कि भारत नदियों के बहाव को रोक रहा है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी नदियों पर बनी भारतीय परियोजनाएं पानी की खपत नहीं करतीं और पानी को आगे (डाउनस्ट्रीम) भेजने से पहले बिजली पैदा करती हैं।उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद का अभियान भारत के विकास में देरी करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे बदनाम करने और पानी के उस संकट से ध्यान भटकाने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है, जो पूरी तरह से खुद पैदा किया गया है। इसकी जड़ें पंजाब के दबदबे, सामंती जमींदारी व्यवस्था, शहरी झुकाव और नहरों के खस्ताहाल बुनियादी ढांचे में हैं।
आरिफ जकारिया ने क्या कहा
लंदन में रहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता आरिफ आजकिया ने कहा कि पानी का अधिकार एक बुनियादी मानवाधिकार है। इससे पाकिस्तान के सैन्य तंत्र ने सिंध को वंचित रखा है। सिंध में कोट्री के पास सिंधु नदी का बहाव ऊपर की ओर नहरों के जरिए पानी मोड़े जाने के कारण बहुत कम हो गया है।2001 में संसद पर हमले से लेकर 2008 में मुंबई में हुए नरसंहार, पुलवामा हमले और पिछले साल पहलगाम में हुई हत्याओं तक भारत में हुए बड़े आतंकी हमलों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का 65 साल पुराने समझौते को निलंबित करने का फैसला सही था।
NGO ने दिए अपने तर्क
एक भारतीय NGO ने बीते हफ्ते IWT (सिंधु जल संधि) की समीक्षा की मांग की है। इसका तर्क है कि इस क्षेत्र में पानी की सुरक्षा से जुड़ी बदलती स्थितियों को देखते हुए 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते का आज के मानवाधिकारों के नजरिए से फिर से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।सुरक्षित पेयजल और साफ-सफाई के मानवाधिकारों पर विशेष रिपोर्टर के साथ इंटरैक्टिव डायलॉग के तहत UNHRC के 63वें सत्र में आइटम 3 पर अपना बयान देते हुए, दिल्ली स्थित NGO ने कहा कि पानी तक पहुंच का सीधा संबंध जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, सम्मान और विकास के अधिकारों से है।
NGO ने कहा कि सिंधु संधि लंबे समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक अहम उदाहरण होने के बावजूद छह दशक में पानी की सुरक्षा से जुड़े हालात बदल गए हैं। इसमें आबादी में बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पीछे हटने, भूजल के कम होने और नदियों के बहाव में लगातार अनिश्चितता जैसे कारण हैं।
