1 जुलाई 2015. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'डिजिटल इंडिया' की शुरुआत करते हुए कहा था कि आज बच्चा भी डिजिटल ताकत को समझता है। हम इस बदलाव को न समझे तो दुनिया से पीछे रह जाएंगे।
17 नवंबर 2023. पीएम मोदी ने अपना गरबा करते हुए डीपफेक वीडियो वायरल होने पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि इससे नया संकट आएगा। ज्यादातर लोगों के पास डीपफेक को कंफर्म करने की सुविधा नहीं है। इससे किसी भी अफवाह को आसानी से फैलाया जा सकता है।
2015 से 2023 तक पूरे देश में आम और खास लोगों ने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन देखा, लेकिन साइबर अपराधी सबसे चार कदम आगे ही रहे। हाल ही में उत्तर प्रदेश में पहली बार ‘डीपफेक’ और ‘डिजिटल अरेस्ट’ से ठगी करने के दो मामले सामने आए। इनमें से एक मामले की पीड़ित इंजीनियर है, जिन्हें आम लोगों के मुकाबले टेक्निकली मजबूत माना जाता है। इससे पता चलता है कि साइबर क्राइम का शिकार कोई भी हो सकता है। मंडे स्पेशल में ठगी के इन दोनों तरीकों के बारे में जानते हैं। पहले दोनों मामलों का एक-एक केस जान लेते हैं-
पहला केस- नए स्मार्टफोन में फेसबुक खोलते ही हुए डीपफेक के शिकार
गाजियाबाद निवासी अरविंद शर्मा की बेटी मोनिका शर्मा बताती हैं कि पापा ने कुछ दिन पहले नया स्मार्टफोन लिया और उसमें फेसबुक अकाउंट बनाया। 4 नवंबर को उनके पास एक लड़के की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। बाद में उसी आईडी से पापा के पास वीडियो कॉल आई तो सामने एक न्यूड लड़की थी।
पापा ने सकपकाकर फोन काट दिया लेकिन शाम को एक वीडियो कॉल आया और सामने वाले ने कहा कि वह द्वारका का एसएसपी है। आप पर एक लड़की को मॉलेस्ट करने का केस हुआ है और लड़की ने सुसाइड भी कर लिया है। मामला सेटल करना चाहते हो तो साइबर सेल वालों से बात कर लो वरना जेल में सड़ना पड़ेगा।
आरोपियों ने पापा से अलग-अलग अकाउंट में 74 हजार रुपए ले लिए। परेशान होकर पापा तो सुसाइड करने की सोचने लगे थे, इसलिए मैंने उनका मोबाइल अपने पास रख लिया। उस आईडी से दोबारा कॉल आई तो मैंने कॉल करने वाले से एफआईआर की कॉपी मांगी। उसने फोन काट दिया। पुलिस का कहना है कि आरोपी ने AI से रिटायर्ड ADG प्रेम प्रकाश का डीपफेक वीडियो बनाया था।
दूसरा केस- 8 घंटे डिजिटल अरेस्ट कर 11 लाख लिए, घरवालों को कॉल भी नहीं कर सकी
नोएडा की महिला इंजीनियर सीजा टीए बताती हैं, मेरे पास 13 नवंबर को एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को टेलीफोन रेगुलेटरी ऑफ इंडिया (TRAI) का अफसर बताया। उसने कहा कि मेरे आधार कार्ड से एक सिम कार्ड खरीदा गया है और उससे 2 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की गई है।
मैंने किसी भी ठगी में हाथ हाेने से इनकार किया तो उन्होंने तुरंत स्काइप (SKYPE) पर वीडियो कॉल की। अब वीडियो पर मुंबई पुलिस, क्राइम ब्रांच और कस्टम के अधिकारी यूनिफॉर्म में थे। उन्होंने कहा कि जिनसे 2 करोड़ रुपए बरामद हुए थे, उन्होंने कहा है कि मुझे 20 लाख रुपए कमीशन दिया गया।
यह सुनकर मेरे होश उड़ गए। मैंने कमीशन मिलने से इनकार किया और अपने घरवालों से बात करनी चाही। उन्होंने मुझे ऐसा नहीं करने दिया और मुझसे कमीशन के 20 लाख रुपए वापस मांगे। मेरे मना करने पर वे मुझसे सादे कागज पर साइन मांगने लगे। मैंने इससे भी इनकार किया तो वे मुझे गिरफ्तार करने की धमकी देने लगे।
मैं डर गई थी और उनको बताया कि मेरे पास सिर्फ 11 लाख रुपए हैं। उन्होंने RTGS से मेरे अलग-अलग खातों से 11 लाख रुपए एक खाते में ट्रांसफर करवा लिए। यह घटनाक्रम पूरे आठ घंटे तक चला।
साइबर क्राइम थाने जाने पर पता चला कि मेरे खिलाफ ऐसा कोई मामला ही नहीं है। पुलिस ने पैसे वापस दिलाने का भरोसा दिया लेकिन 16 दिन बाद भी पैसे नहीं आए तो मैं दोबारा थाने गई। पुलिस ने तब जाकर कहा कि यह ‘डिजिटल अरेस्ट’ का मामला है और केस दर्ज किया।
ऊपर के दो मामले बताते हैं कि अपराधी तकनीक के इस्तेमाल से कानून से भी दो कदम आगे रहते हैं। मोबाइल और इंटरनेट यूज करने वालों के लिए ‘डीपफेक’ और ‘डिजिटल अरेस्ट’ सबसे नए खतरे हैं। इनसे निपटने के पुख्ता तरीके किसी को नहीं पता। इसलिए सावधानी ही बचाव है। पहले डिजिटल अरेस्ट के बारे में जानते हैं, जो इस समय चर्चा में है।
डिजिटल अरेस्ट में कोर्ट का ऑर्डर दिखाकर जमानत देने के नाम पर ठगी
हाल ही में दिल्ली, फरीदाबाद और नोएडा में डिजिटली अरेस्ट करने के मामले सामने आए हैं। इसमें किसी का आधार नंबर हासिल करके साइबर क्रिमिनल उसे झांसे में ले लेते हैं। कोर्ट का फेक ऑर्डर दिखाकर डिजिटल अरेस्ट करने की बात कहते हैं और फिर जमानत देने के नाम पर ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। इस दौरान व्यक्ति को कैमरे के सामने से हटने नहीं दिया जाता। फोन पर कोई ऐप डाउनलोड करवाकर सारी गतिविधि ट्रैक करते रहते हैं।
पुलिस नहीं करती किसी को भी डिजिटली अरेस्ट, ऐसा प्रावधान ही नहीं
उत्तर प्रदेश पुलिस के स्पेशल डीजी प्रशांत कुमार बताते हैं कि पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी किसी संदिग्ध या आरोपी से डिजिटली पूछताछ नहीं करती। कानून में ऐसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है। यह साइबर अपराधियों का गढ़ा फॉर्मूला है। अपराध किसी भी तरह का हो, पुलिस या कोई जांच एजेंसी सबसे पहले आमने-सामने बुलाकर ही पूछताछ करती है। डिजिटली पूछताछ में आरोपी या संदिग्ध के फरार होने का खतरा रहता है।
किसी पुलिस अफसर के नाम से फोन आए तो हो जाएं अलर्ट, ये फेक
साइबर एक्सपर्ट कामाक्षी शर्मा कहती हैं कि किसी अनजान नंबर से वीडियो कॉल आए और फोन करने वाले का नाम किसी पुलिस रैंक जैसे- इंस्पेक्टर, SP, SSP, ADG या CBI इंस्पेक्टर, Income Tax Inspector, ED Officer ऐसे लिखा आए तो समझ जाएं कि फेक कॉल है। जैसे ही शक हो तो फोन काट दें। किसी लिंक पर क्लिक न करें और न ही कुछ डाउनलोड करें। फ्रॉड की जानकारी तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर दें।
पोर्न और टॉम क्रूज के टिकटॉक वीडियो से दुनिया में छाया डीपफेक
डीपफेक दो वजहों से दुनिया भर में सुर्खियों में आया। पहली घटना थी, 2017 में अमेरिकी सोशल न्यूज प्लेटफॉर्म Reddit पर डीपफेक आईडी से एक्ट्रेस एमा वॉटसन, गैल गैडट, स्कारलेट जोहानसन के पोर्न वीडियो अपलोड होना।
दूसरी बार, यह पॉपुलर हुआ हॉलीवुड स्टार टॉम क्रूज के डीपफेक अवतार से। डीपफेक और विजुअल एक्सपर्ट क्रिस उमे और टॉम क्रूज ने मिलकर मार्च 2021 में टिकटॉक पर टॉम क्रूज के डीपफेक वीडियो बनाए। इसमें उन्होंने लोगों को डीपफेक के प्रति अवेयर करने का काम किया। उन्होंने ‘सिंघम’ के अजय देवगन की शक्ल को कियानू रीव्स से बदलकर भी वीडियो बनाया था।
किसी को हर्ट करने, मार्केटिंग या विज्ञापन के लिए डीपफेक अनैतिक
क्रिस कहते हैं कि हम हमेशा ध्यान रखते हैं कि इसका दुरुपयोग न हो। हम उन क्लाइंट को साफ मना कर देते हैं जो किसी तरह की मार्केटिंग के लिए, किसी को हर्ट करने के मकसद से या किसी प्रोडक्ट का एडवर्टिजमेंट करने के मकसद से डीपफेक का इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसके अलावा हमारा पैनल हर तीन महीने में वकीलों और कॉपीराइट एक्सपर्ट से चर्चा करते हैं। दुनिया भर में बनने वाले नए कानूनों पर नजर रखते हैं।
नई-पुरानी टेक्नोलॉजी का डेडली कॉम्बिनेशन डीपफेक, पहचानना मुश्किल
डीपफेक में असली-नकली को पहचानना बहुत मुश्किल होता है। अभी तक ऐसा कोई सर्टिफाइड टूल नहीं है जो डीपफेक वीडियो की पहचान कर सके। इसकी वजह है नई और पुरानी तकनीक का डेडली कॉम्बिनेशन। डीपफेक नई तकनीक AI और और पुरानी तकनीक मशीन लर्निंग सॉफ्टवेयर दोनों को मिलाकर बनाया जाता है। फिलहाल गूगल, अमेजन और मेटा जैसी कंपनियां डीपफेक को पहचानने का मैकेनिज्म बनाने की कोशिश कर रही हैं। 2017 में पहली बार सामने आया ‘डीपफेक’ शब्द अब बहुत बदल गया है।
डीपफेक फैलाने वालों को भी कानूनी शिकंजे में कसने की तैयारी
डीपफेक एक्सपर्ट किस तरह तकनीकी मामले में दो कदम आगे रहते हैं, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। 2018 में अमेरिकी रिसर्चर्स ने डीपफेक की पहचान के लिए बताया कि फेक वीडियो में दिखने वाले इंसान की पलकें नहीं हिलाते हैं, तो इसके कुछ महीने बाद ही फेक वीडियो में पलकें भी हिलने लगीं।
फिलहाल, केंद्रीय दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 23 नवंबर को बताया कि सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ मीटिंग हुई है। डीपफेक बनाने वाले और उसे जिस प्लेटफॉर्म पर उसे दिखाया जाएगा, दोनों पर ही कार्रवाई की जाएगी। डीपफेक को पोस्ट करने से रोकने, डीपफेक वीडियो वायरल होने से रोकने, इसकी शिकायत आसान बनाने और लोगों में अवेयरनेस बढ़ाने पर काम हो रहा है। उम्मीद है कि आने वाले समय में डिजिटल क्रिमिनल से निपटने के लिए जल्द ही सख्त कानून बनेगा।
वहीं, साइबर एक्सपर्ट कामाक्षी शर्मा कहती हैं कि डिजिटल क्राइम से बचने के लिए अवेयरनेस जरूरी है। देश में रोज 170 करोड़ रुपए के साइबर क्राइम रिपोर्ट हो रहे हैं। इसमें 98 फीसदी अपराध जानकारी की कमी से होते हैं। अभी अपराधी भी AI का केवल .001% ही इस्तेमाल कर पाए हैं। आने वाले समय में अपराध के और भी नए तरीके देखने को मिल सकते हैं। इनसे निपटने के लिए नए साइबर लॉ बनाने की जरूरत है। ये जितनी जल्दी बनेंगे, उतनी ही कुशलता और तेजी से साइबर क्राइम पर लगाम लगाने में आसानी होगी।











