बहुत कुछ लिखा गया, बहुत कुछ लिखा जाना अभी बाकी है..

बहुत कुछ लिखा गया, बहुत कुछ लिखा जाना अभी बाकी है..
बहुत कुछ लिखा गया,
बहुत कुछ लिखा जाना अभी बाकी है।

बहुत कुछ पढ़ा गया,
बहुत कुछ पढ़ा जाना भी शेष है।

पर मैंने हर बार यही कोशिश की 
कि जब भी कलम उठाऊँ,
तो केवल अक्षर न उकेरूँ,
भाव गढ़ूँ, आत्मा लिखूँ।

चाहे वह कविता हो या व्यंग्य,
विचार हो या लेख 
हर शब्द में अपना अंश डाल दूँ,
हर पंक्ति में स्वयं को उतार दूँ।

मैं चाहता हूँ 
जो पढ़े, वह केवल अर्थ न देखे,
बल्कि मेरे मन की धड़कन सुन सके।
हर पाठक को अपने शब्दों से
धीरे-धीरे अपनी ओर खींच लूँ,
जैसे कोई जादूगर
संवेदना की डोर से बाँध लेता है।

क्योंकि शब्द मेरे लिए मात्र साधन नहीं,
वे मेरे अनुभवों का विस्तार हैं।
हर अक्षर मेरी सांसों से जन्म लेता है,
हर पंक्ति मेरे हृदय से बहती है।

मैं चाहता हूँ 
मेरी रचनाएँ कागज़ तक सीमित न रहें,
वे पाठक के भीतर घर बना लें,
जहाँ वह लौट-लौट कर जाए,
और हर बार कुछ नया पाए।

मेरे शब्दों में वह जादू हो,
जो न किसी तिलिस्म से बनता है,
न किसी मन्त्र से 
बल्कि सच्चाई से,
जीवन की खुरदुरी सच्चाई से।

मैं चाहता हूँ —
जो भी मेरे लेख को पढ़े,
वह महसूस करे 
यह तो मेरा ही मन बोल रहा है।
यह लेखक नहीं,
मेरा अपना विचार है, मेरी अपनी बात है।

मेरी यही चाह है 
कि जब भी कोई पंक्ति मेरे नाम से चले,
तो वह मेरे होने का परिचय न दे,
बल्कि उस समाज, उस समय, उस भाव का
प्रतीक बन जाए।

मैं चाहता हूँ, मेरे शब्द
सिर्फ अर्थ न रचें 
अर्थ की परतों को भी खोलें,
और मन की गहराइयों तक पहुँचें।

बहुत कुछ अभी बाकी है 
कहने को, सुनने को, लिखने को।
पर जब तक कलम चलती रहेगी,
मैं हर बार यही प्रयास करता रहूँगा 
कि मेरे शब्दों से
हर मन महक उठे,
हर हृदय कुछ देर ठहर जाए,
और हर पाठक
मेरी ओर खिंचता चला आए...

-राजेन्द्र सिंह जादौन, लेखक

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