बिहार में इस लोकसभा चुनाव मंडल या कमंडल? कौन होगा पास और कौन होगा फेल?
पटना: अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए हर दल या गठबंधन अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र को धार देने में जुटा है। विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के पास महंगाई-बेरोजगारी जैसे पारंपरिक मुद्दों के अलावा अब जाति का ब्रह्मास्त्र हाथ लग गया है। हालांकि अभी तक इसका परीक्षण नहीं हो पाया है, जिससे भरोसा किया जा सके कि यह धोखा नहीं देगा। ऐसा सोचने या कहने का आधार यह है कि मंडल आयोग की रिपोर्ट से पिछड़ों को जिस संजीवनी की उम्मीद की जा रही थी, उसकी असलियत अब सामने है। मंडल पर कमंडल की राजनीति का कमाल ही है कि आज भाजपा प्रचंड बहुमत से दूसरी बार केंद्र की सत्ता में सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है। हालांकि इस दफे लोकसभा चुनाव 2024 की शुरुआत बिहार से हुई है। NDA ने 'कमंडल का दिव्यास्त्र' निकाला है तो जवाब में इंडिया गठबंधन ने 'जाति का ब्रह्मास्त्र' निकाला है।
कमंडल के बिना मंडल की राजनीति कभी कामयाब नहीं रही
यह सभी जानते हैं कि मंडल की राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी भी बिना कमंडल कभी कामयाब नही हो पाए। भाजपा ने न सिर्फ नीतीश कुमार को सीएम के पद पर बिठाया, बल्कि अपने मुखर विरोधी लालू प्रसाद यादव के लिए सत्ता में आने की सीढ़ी बनी। भाजपा से खार खाने वाली बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की राजनीतिक चमक केंद्र की भाजपा सरकार में मंत्री बनने के बाद ही बढ़ी। मंडल कमीशन की रिपोर्ट को हरी झंडी दिखाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भी भाजपा के सहारे ही बनी थी। यानी भाजपा की कमंडल की राजनीति हमेशा मंडल की राजनीति करने वालों की सहयोगी रही है।
मंडल की धधकी आग पर कमंडल से ही काबू पाया गया था
याद करें वर्ष 1989-90 का वह दौर, जब भारतीय समाज मंडल के कारण साफ-साफ दो हिस्सों में बंट गया था। देश में विद्वेष की आग इतनी लहक चुकी थी कि खून की नदी की नौबत आ गई थी। भाजपा के कमंडल ने ही समाज को तब जोड़ने का काम किया। लालकृष्ण आडवाणी की राम मंदिर निर्माण के निहितार्थ निकाली गई रथयात्रा ने मंडल की आग पर पानी फेरने का काम किया। देश में शांति बहाल हुई। आडवाणी का रथ रोक कर लालू ने उन्हें गिरफ्तार कराया। पर, यह जनता को नहीं जंचा और मंडल के सहारे सत्ता में पांव जमाए लालू यादव को जनता ने खारिज कर दिया।
कमंडल की राजनीति बीजेपी का आजमाया चुनावी नुस्खा है
भाजपा ने आरंभ से अब तक अपना नुस्खा अपनाना जारी रखा है तो इसके पीछे उसके नेताओं का गंभीर मनन-चिंतन है। उनकी आस्था आज भी कमंडल में है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के ऐन वक्त पर अयोध्या में राम मंदिर आम जन के दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा। राम मंदिर की प्रतिकृति की पहुंच हिन्दू घरों में होने लगी है। भाजपा का धुर विरोधी और विपक्ष के किसी भी दल का समर्थक हिंन्दू परिवार क्या उसे अपने घर में रखने से परहेज करेगा ? समर्थक ही क्यों, विपक्षी दलों का कोई भी नेता हिकारत की हिम्मत जुटा पाएगा? भाजपा को भावनाएं भुनाने की कला आती है। जन मन की बात भांपने में भाजपा से आगे कोई निकल कर तो दिखाए ! लेने के देने पड़ जाएंगे।
कांग्रेस का जातियों की आबादी के हिसाब से आरक्षण का वादा
कांग्रेस क्यों भूल जाती है कि बिहार के जिस जाति सर्वेक्षण पर राहुल गांधी इतरा रहे हैं, उसके लिए मंडल कमीशन की सौंपी रिपोर्ट उनके दादी-पिता ने ही कबाड़खाने में डाल रखा था। इसका उन्हें जीते जी लाभ भी मिला। सवर्णों का लंबे वक्त तक कांग्रेस का साथ मिलता रहा। अब बिहार की जाति गिनती वाली रिपोर्ट निकली तो आबादी के हिसाब से राहुल आरक्षण की बात कह रहे हैं। हालांकि समझदार जानते हैं कि यह इतना आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए उन्हें पहले सत्ता में आना होगा। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से आरक्षण की तय सीमा की बाधा पार करनी होगी। हां, उनके इस वादे से लंबे समय तक साथ देने वाले सवर्ण समर्थक बिदक गए तो फिर कांग्रेस का आधार वोट बैंक ही खाली हो जाएगा। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार सुरेन्द्र किशोर कहते हैं- 'लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राजीव गांधी ने मंडल आरक्षण (1990) पर ढुलमुल नीति अपना कर अपना बहुत सारा पिछड़ा वोट खो दिया था। उसके बाद से कांग्रेस को कभी लोकसभा में अपना बहुमत नहीं मिला। अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि सत्ता में आने के बाद हमारी सरकार जाति सर्वेक्षण कराएगी। अच्छी बात है। जरुर कराइएगा। उसकी जरुरत भी है। पर, आपके इस वायदे के बाद अब इसका आपके समर्थक सवर्ण वोट पर कैसा असर पड़ेगा? जरा इसका भी आकलन कर लीजिए।'











