ब्रह्मोस मिसाइल को चीन के एयर डिफेंस सिस्टम इंटरसेप्ट नहीं कर सकते ये पाकिस्तान के खिलाफ पिछले साल के संघर्ष से पूरी दुनिया को पता चल गया है। इसीलिए ब्रह्मोस के डिमांड में भारी उछाल आया है। वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम इस महीने भारत की यात्रा पर थे और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। इसके बाद दोनों पक्षों ने ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री पर बातचीत होने की पुष्टि की है। प्रस्तावित ब्रह्मोस सौदा जिसकी अनुमानित लागत 629 मिलियन अमेरिकी डॉलर से 700 मिलियन डॉलर के बीच है और जिसमें संभवतः प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता भी शामिल होगी, वियतनाम को फिलीपींस और इंडोनेशिया के बाद तीसरा विदेशी खरीदार बना देगा।
ब्रह्मोस मिसाइलों की दक्षिण चीन सागर में तैनाती करेगा वियतनाम!
ब्रह्मोस की 290 किलोमीटर की रेंज, सुपरसोनिक स्पीड और 200 किलोग्राम का वॉरहेड इसे डिस्ट्रॉयर और एम्फीबियस असॉल्ट शिप जैसे बड़े जंगी जहाजों पर हमला करने में सक्षम बनाता है। अगर ब्रह्मोस को उत्तरी वियतनाम में तैनात किया जाता है तो वे टोंकिन की खाड़ी में एक बहु-स्तरीय एंटी-शिप सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं जिससे हैनान से निकलने वाले चीनी जंगी जहाजों को खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा वियतनाम इन मिसाइल सिस्टम को अपनी व्यापक 'एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल' (A2/AD) रणनीति में शामिल कर सकता है। इस रणनीति की खासियत यह है कि यह चीन की बेहतर नौसैनिक शक्ति का मुकाबला करने के लिए एक बहु-स्तरीय और असममित दृष्टिकोण अपनाती है।ब्रह्मोस और VSM-01A मिसाइलें, किलो-क्लास पनडुब्बियां, भारतीय Su-30 लड़ाकू विमान और द्वीपों का धीरे-धीरे विस्तार करना ये सभी दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के क्षेत्रीय दावों को मजबूत करते हैं और साथ ही वियतनाम के खिलाफ जोर-जबरदस्ती करने पर भयानक अंजाम का खतरा बढ़ाते हैं। ब्रह्मोस जैसे अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों की बिक्री भारत के साथ वियतनाम की रक्षा साझेदारी को और भी मजबूत करती है। वियतनाम शायद अपने ब्रह्मोस सिस्टम के पुर्जों, रखरखाव, सॉफ्टवेयर अपडेट और संचालन के प्रशिक्षण के लिए भारत पर ही निर्भर रहेगा और इस तरह ये मिसाइलें दोनों पक्षों के बीच दीर्घकालिक सहयोग का एक मुख्य केंद्र बन जाएंगी।











