देखते ही देखते अपना मध्यप्रदेश अब 70 साल का हो गया। मनुष्य के जीवन में सत्तर की उम्र अमूमन वानप्रस्थाश्रम (राजनेताअों को छोड़कर) की होती है, लेकिन किसी देश और प्रदेश के लिए यह अंक महज एक पड़ाव भर है। एक क्षण पीछे मुड़कर देखने का और हर घड़ी आगे की अोर देखते और बढ़ते रहने का है। भारत में अधिकांश प्रदेशों की अपनी सांस्कृतिक, भाषिक और भौगोलिक अस्मिता रही है। लेकिन मध्यप्रदेश संभवत: अकेला ऐसा राज्य है, जिसकी मुख्य पहचान ही उसका भूगोल है। चूंकि वह इस विशाल देश के बीचों- बीच है, इसलिए ह्रदय प्रदेश है, सुप्त न हो, लेकिन संतोषी प्रदेश है और ह्रदय क्षेत्र होने के कारण कई बोझ, सपने और सौजन्य भी पाले हुए है। यूं मप्र कई बोलियों, उपसंस्कृतियों, समुदायों और प्राकृतिक विविधताअोंका सुंदर मेल है, वहीं ‘मध्यप्रदेशी’ होने का ठीक-ठीक अर्थ पूछा जाए तो आज भी सिर खुजाना पड़ता है। बहरहाल सत्तर साल के इस बहुआयामी सफर के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है िक मध्यप्रदेशी होने का भावनात्मक दृष्टि से अर्थ मध्यमार्गी होना है। सहिष्णु और समावेशी होना है। मध्यप्रदेश ने एक इकाई के रूप में अपना राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सफर 1 नवंबर 1956 को तब प्रारंभ किया था, जब उसे राजनीतिक और भौगोलिक जोड़तोड़ के बाद एक ऐसे राज्य के रूप में आकार िदया गया था, जो सात क्षेत्रीय अस्मिताअों से जुड़ता तो था, लेकिन उसकी स्वयं की अपनी अलग कोई पहचान नहीं थी। यानी यही पहचान थी कि मप्र की कोई स्वतंत्र पहचान नहीं थी। वस्तुत: बीते सात दशक मप्र की इसी ‘आत्म की पहचान’, स्थायी ‘स्व की खोज’ और एकात्मता के अन्वेषण की यात्रा है। निरपेक्ष भाव से देखें तो इस अनंत यात्रा की प्रमुख सात मंजिलें हैं, जिनमें से कुछ मध्यप्रदेश ने हासिल कर ली हैं तो कुछ की प्राप्ति के लिए उसकी जद्दोजहद और संकल्प यात्रा गतिमान है।
इस देश में मप्र अकेला ऐसा राज्य नहीं है, जिसका आधुनिक राज्य के रूप में जन्म 1 नवंबर 1956 को हुआ। आंध्रप्रदेश ( अविभाजित), केरल और कर्नाटक राज्य ( बाद में छग भी) की स्थापना भी इसी दिन हुई थी। यूं भी 1956 का साल भारतीय गणतंत्र में राज्यों के नए जन्म का साल था। भाषायी आधार पर ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए तत्कालीन नेहरू सरकार ने इस साल कुल 14 नए राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेशों के गठन को मंजूरी दी थी। इनमें से चार राज्य 1 नवंबर को वजूद में आए। हालांकि ये सब अपना ‘बर्थ डे’ अलग-अलग ही मनाते रहे हैं। लेकिन मप्र के अलावा बाकी तीन राज्यों के जन्म का मुख्य आधार एक भाषा और काफी हद तक समान संस्कृति थी। लेकिन मप्र में मोटे तौर पर बोली जाने वाली संपर्क भाषा भले हिंदी हो, लेकिन जिन भौगोलिक टुकड़ों को जोड़कर इसे बनाया गया था, उनकी राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक स्थिति और मानसिकता में भी काफी अंतर था। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘मध्यप्रदेश’ पहले बना, ‘मध्यप्रदेशीपन’ अब रूप ले रहा है।
जिन ‘सात मंजिलों’ की बात हम कर रहे हैं, उनमें से कुछ तो काफी हद तक हासिल कर ली गई हैं, जैसे कि मध्यप्रदेश की अस्मिता की खोज और उसे आत्मसात करना। मप्र बनने के चार दशकों तक यह राज्य और इसके रहवासी मालवी, बुंदेली, निमाड़ी, चंबलवासी, महाकोशली, छत्तीसगढ़ी में बंटे हुए थे। कहा जाता था कि जब तक मप्र का भावनात्मक एकीकरण नहीं होगा, तब तक यह राज्य विकास के राजमार्ग पर नहीं दौड़ सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी राज्य के विकास का बड़ा कारण उसकी राजनीतिक स्थिरता, एकता, प्रबुद्ध चेतना और सांस्कृतिक आग्रह भी है। दूसरे, नवगठित मप्र का प्रशासनिक दृष्टि से भी चरित्र अलग-अलग था। कहीं वह सामंती था तो कहीं औपनिवेशिक था। सात दशकों में इतना तो हुआ है कि मध्यप्रदेश अपने उस ऊबड़-खाबड़ चरित्र से एक समतल पर तो आ गया है। भले ही दक्षता, ईमानदारी, पारदर्शिता और परफार्मेंस के पड़ाव अभी हासिल करने हैं। आज नई पीढ़ी स्वयं को मध्यप्रदेशी कहलाने में संकोच नहीं करती। मध्यप्रदेशी होने के साथ- साथ अपनी आंचलिक अस्मिता बताना भी अब जरूरी नहीं है। प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण कमोबेश हो चुका है, जिसमें अच्छाइयां और बुराइयां दोनो निहित हैं। शायद इसीलिए राज्य में चुनावी जनादेश प्राय: स्पष्ट रूप से आता है। इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें मप्र ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। वो है- कृषि उत्पादन, खेल तथा अधोसंरचना विकास। हालांकि हम अभी भी औद्योगिक राज्य नहीं हैं। रोजगार सृजन और मानव संसाधन प्रदाता के रूप में हमारी भूमिका मिली जुली है। हालांकि मप्र के युवा अखिल भारतीय स्तर पर कई क्षेत्रों में प्रदेश का नाम ऊंचा कर रहे हैं। लेकिन मप्र में देश की सर्वाधिक आदिवासी आबादी निवास करती है, उसे मुख्य धारा में लाने में जितनी सफलता मिलनी चाहिए थी, वह अभी तक नहीं मिली है।
लेकिन जो मंजिलें अभी अधूरी हैं, उनमें सबसे अहम है मानव विकास सूचकांक की चुभती सुइयां। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि के क्षेत्र में मप्र की उपलब्धियां अभी भी अपेक्षा से बहुत कम हैं। मप्र ‘बीमारू’ राज्य की िगरफ्त से भले बाहर आ गया हो, लेकिन ‘तीरमारू’ राज्य बनने के लिए उसे अपने ही पड़ोसी प्रतिद्वंद्वियों से सख्त प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी।
मप्र उन राज्यों में से है, जिन्हें प्रकृति ने जी भर कर सौगात दी है। जैविक विविधता जबर्दस्त है। मप्र के शहर गांव ही नहीं, यहां के जंगल भी दूसरे प्राणियों को पनाह देने में पीछे नहीं हैं। चीते और डाॅल्फिन इसके उदाहरण हैं। लेकिन मानव विकास के अंधाधुंध गतिविधियां मप्र के इस अलंकार पर भी डाका डाल रही हैं। भूख, गरीबी, कुपोषण और ज्यादा मातृ और शिशु मृत्यु दर अभी भी मध्यप्रदेश के सुखी राज्य बनने में बड़ा रोड़ा हैं। ये वो मुिश्कल और चुनौती भरी मंजिले हैं, जिन्हें पार कर हम देश के उन राज्यों की पांत में बैठ सकते हैं, जो अपेक्षाकृत विकसित और सम्पन्न का टैग लिए बैठे हैं। बावजूद राजनीतिक रूप से सरकार किसी की हो, सभी मप्र की नैया को खेने की पूरी कोशिश करते रहे हैं। चाहे रविशंकर हों या मोहन। शुक्ल हों या यादव।
सत्तर को संस्कृत में सप्तति कहते हैं और सात का अंक पूर्णांक माना जाता है, क्योंकि यह अविभाज्य है। सप्तति को भी पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक माना गया है। लेकिन यह पूर्णता मनुष्य के साथ साथ एक राज्य के अनुभव संसार से भी जुड़ी होती है। मनुष्य ढलती उम्र में बैरागी हो सकता है, लेकिन किसी देश या राज्य के शब्दकोश अथवा स्वप्नकोश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यहां ‘चरैवेति’ ही संकल्पसूत्र है। मध्यप्रदेश की आत्मा उसकी सहिष्णुता और चरित्र समावेशिता है। ‘ह्रदय प्रदेश’ होने के नाते यह सभी को ‘गुण दोषों’ के साथ स्वीकारता है। मप्र का यह गुण नैसर्गिक और प्रकृति प्रदत्त है। यह संवर्द्धित होगा तो मध्यप्रदेश रहेगा। मध्यप्रदेश रहेगा तो ह्रदय प्रदेश भी रहेगा। ह्रदय प्रदेश रहेगा तो विकास और उत्कर्ष के सप्त सुर भी गूंजेंगे। मप्र के जन्म की यह सत्तरवीं वर्षगांठ उसके अस्तित्व और आत्मीय चरित्र की शताब्दी पूरी होने का आश्वासन भी है। बधाई मध्यप्रदेश..!
-अजय बोकिल,लेखक, संपादक.











