इसे भारत में ब्राह्मणों के हक में सफाई न मानें, लेकिन अमेरिका के मनमौजी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धूर्त ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो का भारत पर यह आरोप कि ‘रूसी तेल से यहां के ‘ब्राह्मण’ तगड़ी कमाई कर रहे हैं,’ न केवल हास्यास्पद, कुटिलतापूर्ण तथा भारत की सामाजिक व्यवस्था की जटिलताओं के प्रति अज्ञानता से भरा है। हाल में अमेरिका में ‘फ़ॉक्स न्यूज़ संडे’ को दिए एक इंटरव्यू में नवारो ने कहा था कि भारतीय कृपया समझें कि यहाँ क्या हो रहा है। ब्राह्मण, भारतीय लोगों की कीमत पर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। हमें इसे रोकना होगा।
नवारो के इस ‘शरारती बयान’ को भारत में सभी राजनीतिक दलों ने सिरे से खारिज कर दिया। भारत सरकार ने इसे 'अनुचित और अव्यावहारिक' बताते हुए कहा कि हम जहां से सस्ता तेल मिलेगा, खरीदेंगे। हम तेल मुनाफे के लिए नहीं अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए खरीदते हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नवारो का 'ब्राह्मणों की मुनाफ़ाखोरी' वाला बयान अंग्रेजों द्वारा 'फूट डालो और राज करो' की नीति जैसा है। अलबत्ता नवारो को भारत में एक समर्थक जरूर मिला। वो हैं कांग्रेस नेता उदित राज ( पूर्व के रामराज)। उन्होने कहा कि मैं नवारो से पूरी तरह सहमत हूं। भारत में निजी भारतीय तेल शोधक ऊंची जाति वालों की हैं और तथाकथित निचली जातियों को तेल शोधक बनने में सदियां लग जाएंगी। यह बात अलग है कि उदित राज के जाति विद्वेष से प्रेरित इस बयान को उनकी ही पार्टी ने तवज्जो नहीं दी।
कहा जा रहा है कि नवारो का यह ‘ब्राह्मण ज्ञान’ अमेरिकी पत्रकारिता में प्रयुक्त ‘बोस्टन ब्राह्मण’ संज्ञा से उपजा है। वो सभी भारत में रईसों को ‘ब्राह्मण जाति’ का समझ बैठे हैं। काश, सच में ऐसा होता..! लेकिन हकीकत इसके लगभग विपरीत है। आज भारत के टाॅप 25 कारोबारियों में एक भी ऐसा नहीं है, जो ब्राह्मण जाति से हो। देश में दो ब्राह्मण अमीर इन्फोसिस के मालिक नारायण मूर्ति और पेटीएम के मालिक विजय शेखर शर्मा जरूर हैं, जिनकी सम्पत्ति 1 अरब अमेरिकी डाॅलर से ज्यादा है, लेकिन उनका नंबर भी देश के अरबपतियों में बहुत नीचे हैं। भारत में ज्यादातर ब्राह्मण आर्थिक रूप से निम्न-मध्य वर्ग अथवा उच्च-मध्यम वर्ग से हैं। अलबत्ता ब्राह्मण अपनी बौद्धिक क्षमता से अन्य जातियों को अमीरों और और अमीर बनने में जरूर पूरी क्षमता से मदद करते रहे हैं। खुद धनाढ्य बनने का सपना पालने वाले ब्राह्मण कम हैं और इसमें कामयाब होने वाले तो और भी उंगली पर गिनने लायक हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि पीटर नवारो ने अमीरी के िलए ब्राह्मणों को ही टारगेट क्यों किया? वो चाहते तो यह भी कह सकते थे कि भारत के बड़े कारोबारी सस्ते रूसी तेल को रिफाइन कर उसे ऊंची कीमत में दूसरों को बेचकर ( नवारो के शब्दों में लाण्ड्रोमेट) और अमीर बनते जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि नवारो की यह ब्राह्मण समझ उस ‘बोस्टन ब्राह्मण’ शब्द से आई है। जिसे 19 वीं सदी के चिकित्सक, लेखक अोलीवर वेन्डेल होम्स सीनियर ने ‘ द अटलांटिक मंथली’ पत्रिका में लिखे एक लेख में प्रयुक्त किया था। यह लेख पत्रिका के जनवरी 1860 के अंक में छपा था। ‘बोस्टन ब्राह्मण’ दरअसल अमेरिका के इस व्यावसायिक शहर में रहने वाले उन 66 अमीर परिवारों के लोग थे, जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी व्यापार-व्यवसाय से अकूत धन कमाया। इनमें से कुछ तो जन प्रतिनिधि भी बने। असल में होम्स ने जुमला गढ़ा था- ‘ब्राह्मीन कास्ट आॅफ न्यू इंग्लैंड।‘ ऐसा लगता है कि होम्स को भारत के ब्राह्मणों के बारे में केवल इतनी जानकारी थी कि वह यहां की जाति व्यवस्था में सर्वोच्च पुजारी जाति है तथा समाज और धर्म को नियंत्रित, संचालित करती है। हालांकि उनकी ज्ञान सम्पन्नता का धन सम्पन्नता से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। यानी भारत में धनाढ्य भी जातीय दृष्टि से कुलीन हो यह जरूरी नहीं है। होम्स ने भारत की पारंपरिक और सामाजिक ‘कुलीनता’ को धनाढ्यता से क्योंकर जोड़ा, इसका कोई आधार नहीं दिखता। क्योंकि तत्कालीन 19 वीं सदी में भी ब्राह्मण ज्ञान-मान की दृष्टि से भले सम्पन्न रहे हों, लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़कर धन की दृष्टि से तब भी विपन्न ही थे। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि ‘दारिद्रय ही ब्राह्मण का भूषण’ है। ब्राह्मण की धन के प्रति लालसा भी अनैतिक है। तप और धर्मचालन करना ही उसका काम है। समाज के दान और भिक्षा पर ही उसका जीवन आश्रित है। उसे इसी में संतोष मानना चाहिए। यही उसकी नियति है। यही कर्तव्य है। सारांश कि आर्थिक सम्पन्नता में ब्राह्मण अपनी तुलना किसी से न करें। यह अपेक्षित भी नहीं है। ज्ञान धन ही उसकी सम्पत्ति है। गौरतलब है कि पुराणों और शास्त्रों में भी ब्राह्मणों का जिक्र अमूमन ‘ एक गरीब ब्राह्मण था...’ के रूप में ही होता है। ‘एक अमीर ब्राह्मण था..’, ऐसा शायद ही कहीं कहा गया हो। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्राह्मण का धनसम्पन्न होना परोक्ष रूप से गाली ही है। ‘गरूड पुराण’ में उल्लेखित एक कथा में एक ब्राह्मण अपनी दरिद्रता से त्रस्त होकर अपने तप से अर्जित पुण्य का सौदा एक धनवान वेश्या से कर लेता है। मृत्यु के पश्चात वेश्या तो स्वर्ग चली जाती है, ब्राह्मण के हिस्से में घोर नरक आता है। वेश्या को ईमानदारी का डिविडेंड मिल जाता है। ब्राह्मण को नहीं।
जाहिर है नवारो ने अपना कमेंट भारत में ब्राह्मणों की वास्तविक माली हालत के संदर्भ में तो नहीं ही किया होगा। उधर होम्स के जुमले में भी जातीय उच्चता का आर्थिक सम्पन्नता के साथ घालमेल किया गया है। ब्राह्मण शब्द का निहितार्थ जाने बगैर उसे लक्ष्मी पुत्रों पर आरोिपत कर दिया गया, जबकि होना यह सरस्वती पुत्रों के साथ था।
भारतीय अर्थ शास्त्री और इतिहासकार संजीव सान्याल के अनुसार नवारो के शब्द साफ बताते हैं कि अमेरिका में भारत के बारे में नैरेटिव कौन कंट्रोल करता है। उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे 19वीं सदी के औपनिवेशिक तानों से लिया गया है, जैसे जेम्स मिल ने किया था। सान्याल ने कहा कि एडवर्ड सईद की "ओरिएंटलिज़्म" वाली थ्योरी मिडिल ईस्ट से ज्यादा भारत पर लागू होती है। साफ है कि नवारो और उनके आका ट्रंप पश्चिम की बूटी और चश्मे से पूरब के भारत का इलाज करना चाहते हैं। जोकि असंभव है। और उनकी नीयत भी साफ नहीं है। भारत को झुकाने के लिए अब उन्होंने हमारे देश की उन दरारों में भी टांग फंसानी शुरू कर दी है, जिससे हम खुद सालो से जूझ रहे हैं। वरना ‘ब्राह्मण’ शब्द का गलत संदर्भ में प्रयोग किया ही नहीं होता। कुलीनता की उनकी और हमारी परिभाषाएं अलग हैं। क्योंकि इस देश में ब्राह्मण, जोिक कुल जनसंख्या का महज 5 फीसदी ( उनकी प्रभावशीलता ज्यादा हो सकती है) हैं, पर वर्ण व्यवस्था को जिंदा रखने, स्वयं को जाति पिरामिड के शीर्ष पर स्थापित करने, विशेषाधिकार रखने, सनातन की मशाल जलाए रखने, अन्य जातियों को समान अवसर न देने जैसे आरोप तो लग सकते हैं, लेकिन उन पर कारोबारी अमीर होने का आरोप कुटिलता से प्रेरित है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मर्यादा के भी खिलाफ है।
अजय बोकिल, प्रधान संपादक, लेखक











