मैं पत्रकार हूँ, हक़ीक़त को तलाशता हूँ

मैं पत्रकार हूँ, हक़ीक़त को तलाशता हूँ
मैं पत्रकार हूँ,
हक़ीक़त को तलाशता हूँ।
सच की पगडंडियों पर
काँटे भी मिलते हैं, लाठी भी,
लेकिन मैं रुकता नहीं
क्योंकि मेरी कलम खरीदी नहीं जाती,
मेरी रीढ़ झुकती नहीं।

झूठ की भीड़ में
सच हमेशा अकेला होता है।
फिर भी मैं उसी अकेले सच का साथी हूँ।
क्योंकि भीड़ की तालियाँ
मेरी मंज़िल नहीं,
समाज का आईना
मेरी जिम्मेदारी है।

फेक न्यूज़ तो
घर बैठे,
मोबाइल पर स्क्रोल करते-करते,
यूट्यूब की चिल्लाती आवाज़ों में,
व्हाट्सऐप की भनभनाती चैट्स में
आपको रोज़ ही मिल जाती है…

पर सच
उसकी तलाश में
कई बार रातें जागकर कटती हैं,
घंटों सड़कें नापनी पड़ती हैं,
सत्ता के गलियारों में
चुप्पियों को सुनना पड़ता है,
और कभी-कभी अपने ही समाज से
गालियाँ भी खानी पड़ती हैं।

मैं पत्रकार हूँ
इस पेशे में तनख्वाह कम है,
और जोखिम ज़्यादा।
कभी किसी का फोन आता है
“यह खबर मत चलाना…”
कभी कोई दबाव आता है
“यह सवाल मत पूछना…”
लेकिन जब खबर छपती है
और किसी मासूम को इंसाफ़ मिलता है,
तो उसी पल मेरी हर रात,
हर जोखिम,
हर धमकी
कागज़ की तरह हल्की लगने लगती है।

मैं उन गलियों में जाता हूँ
जहाँ कैमरे नहीं जाते,
मैं उन आवाज़ों को सुनता हूँ
जिन्हें माइक्रोफोन नहीं सुनता,
मैं उन सवालों को उठाता हूँ
जिन पर सत्ता को
सबसे ज़्यादा तकलीफ होती है।

क्योंकि पत्रकारिता
न तो नौकरी है,
न ही प्रतिष्ठा की दुकान
यह संघर्ष है,
एक जंग है,
जहाँ सच हथियार है
और साहस ढाल।

लोग पूछते हैं
“इतना जोखिम क्यों?”
मैं कहता हूँ
क्योंकि एक झूठ
पूरे समाज को गूँगा कर देता है,
और एक सच
उस गूँगापन को चीर देता है।

फेक न्यूज़ में मसाला है,
ड्रामा है,
उत्साह है,
लेकिन उसमें
जनता का भविष्य नहीं है।
सच में शायद मज़ा कम हो,
पर उसमें कल की उम्मीद है।

मैं पत्रकार हूँ
लोगों की तकलीफें
मेरे शब्दों में ढलती हैं,
उनका दर्द
मेरी सुर्खियों में जगह पाता है,
उनकी पुकार
मेरी रिपोर्टिंग से
हक़ीक़त बनती है।

फेक न्यूज़ फैलाती है,
पत्रकार जोड़ता है।
फेक न्यूज़ भटकाती है,
पत्रकार रास्ता दिखाता है।
फेक न्यूज़ बिकती है,
पत्रकार की सच्चाई
कभी नहीं बिकती।

मैं पत्रकार हूँ
और मेरा धर्म सिर्फ एक है:
सच।
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