डॉक्टरजी ने जब संघ प्रारंभ किया, तब 'हिंदुत्व' यह शब्द प्रचलन मे नही था। स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी ने 1927 से इस शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया। इसके पहले स्वामी विवेकानंदजी ने हिंदुत्व के लिए 'हिंदूइझम' इस शब्द का प्रयोग किया था। ‘इझम’ याने वाद अर्थात 'हिंदू वाद'। यह शब्द बादमे भी अनेकों बार प्रयोग किया गया। डॉक्टरजी ने ‘हिंदुत्व’ के समानार्थी शब्द के रूप मे ‘हिंदू हूड’ (Hindu hood) इस शब्द का प्रयोग किया हैं (brother hood जैसा)।
मद्रास के डॉक्टर नायडू ने तामिळनाडू मे हिंदू महासभा कॉन्फरन्स का आयोजन किया था। ‘इस कॉन्फरन्स मे डॉक्टर जी ने उपस्थित रहना चाहिए’ ऐसा आग्रह करने वाला पत्र डॉक्टर नायडू ने डॉक्टर जी को लिखा। किंतु स्वास्थ्य ठीक न होने से डॉक्टर जी बिहार के राजगीर मे गये थे। अर्थात उनका मद्रास जाना संभव नही था। इस संदर्भ में अपनी मृत्यू से तीन महिने पहले, अर्थात 1940 के 17 मार्च को, डॉक्टर जी ने मद्रास के डॉक्टर नायडू को पत्र लिखा। ‘हिंदू समाज मे हिंदू जनजागरण के कार्य की आवश्यकता’ इस पत्र में डॉक्टर जी ने अधोरेखित की है। डॉक्टर जी लिखते है – " To arouse the dormant spirit of Hinduhood among our brethren of the South।”
('दक्षिण के बंधूओं मे हिंदुत्व की सुप्त भावनाओं को जगाने का यह कार्य है')
19 ऑक्टोबर 1929 को डॉक्टरजी ने नीलकंठ राव सदाफळ जी को एक पत्र भेजा है। इसमे डॉक्टर लिखते है, "स्वयंसेवकों के मन मे राष्ट्रीयत्व का पूर्णतः संचार करके, हिंदुत्व और राष्ट्रीयत्व में कोई भेद नही है, यह दोनो बाते एकही है, यह तर्कपूर्ण ढंग से समझाना, यह संघ शाखाओं का काम है।”
डॉक्टर जी ने एक जगह लिखा हैं -
सामर्थ्य है हिंदुत्व का
प्रत्येक हिंदू राष्ट्रीय का I
किंतु उसे संगठन का..
अधिष्ठान चाहिये..!
वे आगे लिखते है, " हिंदुस्तान में आसेतू हिमाचल बसने वाले अखिल हिंदूओं का एकरूप और मजबूत संगठन खडा करना यही हमारा वर्तमान धर्म है। हम लोगों मे राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करके,
हिंदू यह सब एक राष्ट्र के अंग है तथा हिंदू समाज के विभिन्न मत - पंथों के आचार - विचार एक ही प्रकार के है, यह वैज्ञानिक दृष्टीसे समझाकर, प्रत्यक्ष कार्य करना है।"
डॉक्टर जी का हिंदुत्व समझने के लिये अत्यंत सरल, सीधा और सुगम था। स्व. दादाराव परमार्थ, उनके 'परमपूजनीय डॉक्टर हेडगेवार' इस लेख मे लिखते है, "यह देश हिंदुओं का है, यह तो हम सब का विश्वास था। हिंदू बाहर से आये है यह कल्पना हमे मान्य नही थी। मूलतः हिंदू इसी देश के है तथा अपने त्याग, समर्पण और कर्तृत्व से यह राष्ट्र उन्होने खडा किया है। इस देश का राष्ट्रीयत्व यह हिंदुत्व है, इस पर डॉक्टर जी की अटूट श्रद्धा थी। इसलिये, इस देश पर पूर्ण समर्पित भाव से प्रेम करने वाला हिंदू हैं। इस देश की प्रगती के लिये अपने आपको झोंककर काम करने वाला हिंदू हैं। इस देश की सर्वांगीण उन्नती के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा करने वाला हिंदू हैं। और ऐसे सारे हिंदूओंका संगठन बांधना यह डॉक्टर जी का ध्येय था। इतने सीधे, सरल और स्वच्छ नजरों से देखने के कारण डॉक्टर जी को हिंदू समाज के भेद-विभेद, जाती-पाती कभी दिखी ही नही। हिंदूओंका संगठन करते समय यह विचार गलतीसे भी उनके मन मे नही आया।”
और इसलिये जाती-पाती के चष्मे से जो लोग हिंदू समाज को देखते थे, उनको बडा आश्चर्य लगता था। महात्मा गांधीजी को भी इसका आश्चर्य लगा था। वर्ष 1934 के दिसंबर मे वर्धा मे संघ का शितकालीन शिवीर लगा था। उन दिनों महात्मा गांधीजी का मुकाम वर्धा शहर मे था। महात्मा जी के बंगले के पास ही यह शिवीर स्थल था, इसलिए महात्माजी को संघ के डेढ़ हजार स्वयंसेवकों के इस अनुशासित शिबिर को देखने की इच्छा हुई। उनकी सुविधानुसार समय तय हुआ। 25 दिसंबर 1934 मंगलवार को प्रातः छह बजे महात्माजी शिबिर को भेट देंगे यह निश्चित हुआ।
महात्मा जी तय समय पर शिबिर मे आए। वे वहां लगभग डेढ़ - दो घंटे रुके। उन्होने शिविर की सारी जानकारी ली। सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते हैं, एकही पंक्ती में भोजन करते है, यह सुनकर और देखकर उन्हे आश्चर्य लगा। जो दिख रहा है, उसमे कितना तथ्य है यह जानने के लिए कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी पूछे। तब, “ये महार, ये ब्राह्मण, ये मराठा, ये दर्जी ऐसा भेदभाव हम नही मानते। हमारे बगल मे किस जाति का स्वयंसेवक बैठा है इसकी कोई जानकारी हमे नही रहती और ना ही वैसी जानकारी लेने की हम में से किसी की भी इच्छा रहती है। हम सब हिंदू है और इसीलिए बंधू है। अतः आपसी व्यवहार में उंच-नीच सोच रखने की कल्पना भी हम नही करते।” इस प्रकार के उत्तर महात्माजी को स्वयंसेवकों से मिले।
यह है डॉक्टर हेडगेवार जी का हिंदुत्व। बिलकुल सीधा और सरल। "हम सब हिंदू है, इसलिये बंधू है" इस एक वाक्य ने हिंदूओंका संगठन खडा किया, जो आज विश्व का सबसे बडा संगठन है।
डॉक्टर जी के संपूर्ण कार्यकाल में वह तात्विक या बौद्धिक विवादोंमे बहुत ज्यादा नही उलझे। उनका जोर, प्रत्यक्ष कार्य पर था। संघ प्रारंभ होने से पहले उन्होने ऐसे सभी विचार प्रवाहों का विस्तृत अध्ययन किया था। हिंदू समाज की कमियां, मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हिंदू समाज मे आई हुई कुरीतियां, कुछ प्राचीन, अप्रासंगिक परंपराएं... इन सबसे वे अच्छी तरह परिचित थे। किंतु इन सब बातों के विरोध में बोलते रहने की अपेक्षा प्रत्यक्ष कार्य कर, कृती रूप उत्तर देने मे उनका विश्वास था।
विभिन्न वैचारिक प्रवाहोंमें, संस्थाओंमें, राजनैतिक दल में कार्य करने के कारण उनके विचारों मे पारदर्शिता और स्पष्टता थी। ‘क्या करना है’ यह उनको अवगत था। इसलिये, संघ स्थापना के बाद उनके 15 वर्षों के कालखंड में, और बाद में भी, संघ पर अनेक संकट आने के बावजूद संघ बढता ही रहा। संघ के प्रारंभिक काल से इस बात की स्पष्टता थी, की संघ का संगठन, हिंदूओंके संरक्षण के लिए बना हुआ कोई रक्षक दल नही है। इसका अर्थ ऐसा की हिंदू समाज ने अपने संरक्षण के लिये संघ को, आज की भाषा में, आऊटसोर्स किया हुआ नही है। संघ के स्वयंसेवक संकटोंका सामना करेंगे, संघर्ष करेंगे और बाकी हिंदू समाज इस संघर्ष की मजा देखता रहेगा, यह उन्हे अभिप्रेत नही था।
संघ का उद्देश्य यह हिंदू समाज का संगठन कर संपूर्ण समाज को सक्षम बनाना यह था / है। इसलिये 'समाजही सब कुछ करेगा' यह भूमिका पहले से आज तक कायम है। यही संघ के यश का सूत्र भी रहा है। संघ ने सही अर्थों में हिंदू समाज का सक्षमीकरण (empowerment) करना यह डॉक्टर हेडगेवार जी को अभिप्रेत था। इसलिये 1925 के बाद इस देश पर आये हुए सभी संकटोंका सामना संघ ने पुरे समाज को साथ लेकर किया है। चार - पांच वर्ष पहले के करोना मे भी संघ स्वयंसेवकोने आगे बढकर अनेक काम किये। किंतु संघ ने कोरोना के इस संघर्ष में संपूर्ण समाज को साथ लेकर सक्रिय किया।
और यही डॉक्टर हेडगेवार जी की दूरदृष्टी सामने आती है। हिंदू संगठन की रचना बनाते समय उन्होंने अत्यंत स्पष्ट और साफ शब्दों मे कहा था, "हमे पुरे हिंदू समाज का संगठन करना है, समाज में संगठन नही करना है"। यह अत्यंत महत्वका सूत्र है। डॉक्टर जी के पहले भी हिंदू समाज मे हिंदू हितों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाये और संगठन तयार हुए थे। किंतु इन सबकी मर्यादाएं थी। समाज के एक प्रवाह जैसे यह संगठन / संस्थाये थी। किंतु प्रारंभसे ही डॉक्टरजीने संघ को हिंदू समाज का एक पंथ या प्रवाह न बनाते हुए, ‘संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन’ इसी स्वरूप मे खडा किया। इसलिये पहले जो संघ के विरोधक थे, वही बाद में संघ के सक्रिय स्वयंसेवक बने।
हिंदूओं का संगठन यह असंभव कल्पना है, ऐसा पहले बोला जाता था। किंतु डॉक्टर हेडगेवार जी ने इस बात को गलत सिद्ध करके बताया। संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करने के लिये उन्होने जो संघ की कार्यपद्धती बनायी, उसकी विश्व मे कोई तुलना ही नही है। इसके कारण एकरूप, एकसमान सोच के, अपनी भारत माता को वैभव के परम शिखर पर पहुंचाने के ध्येय से प्रेरित, ऐसे करोडो हिंदुओं का, विश्व का सबसे बडा संगठन खडा हुआ। यह संगठन, डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात भी 85 वर्ष सतत वर्धिष्णू हो रहा है।
दूरदृष्टी के, भविष्य को देखने की क्षमता रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार जी का यह निर्विवाद यश है..!
- प्रशांत पोळ , लेखक
(रा. स्व. संघ शताब्दी विशेष - ४)











