भोपाल। भगवान श्रीराम आदि काल से जन-जन के नायक रहे हैं और उन्हें मानने वालों की कभी कोई कमी नहीं थी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद राम नाम की चर्चा चहुंओर बढ़ गई है। अयोध्या जी में रामलला की प्राणप्रतिष्ठा के बाद से भक्त राममय हो गए हैं। यही वजह है कि शिल्पों में भी राम की छवियां ज्यादा देखने को मिल रही हैं। शिल्पकार भगवान श्रीराम की विभिन्न कलाकृतियां उकेर रहे हैं, क्योंकि लोग इन्हें पसंद कर रहे हैं। रवींद्र भवन में चल रहे लोकरंग उत्सव के शिल्प मेले में भी यह देखने को मिला, जहां अन्य देवी- देवताओं के साथ ही श्रीराम की कलाकृतियां प्रदर्शित की जा रही हैं। काष्ठ, पत्थर और धातु से बनी श्रीराम की मूर्तियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित लाेकरंग 30 जनवरी तक चलेगा।
मंदिर की थ्री डी रेप्लिका और रामदरबार बनाया
शिल्प मेेले में आए प्रभात सिसोदिया ने अपने स्टाल पर अयोध्या के राममंदिर की थ्रीडी रेप्लिका प्रदर्शित की है, यह मंदिर का हूबहू माडल है, जिसे 360 डिग्री से देखा जा सकता है। प्रभात बताते हैं, यह आकृति मैने दो माह पूर्व पहली बार बनाई थी, इसके बाद कई आकृतियां बना चुके हैं। चार से 10 इंच की इन आकृतियों की कीमत 600 से 2100 रुपये तक है। इसी प्रकार उन्होंने स्टोन कार्विंग में रामदरबार बनाया है। इनका आकार साढ़े पांच से साढ़े छह इंच है। पूजापाठ के अतिरिक्त लोग इन्हें घर की सजावट और प्रतीक चिह्न के रूप में देने के लिए खरीद रहे हैं। प्रखर आर्ट क्रिएशन के संचालक प्रभात ने बताया कि आगे उनकी योजना स्टोन से ही आयोध्या में प्रतिष्ठित श्रीराम की छोटी प्रतिमा बनाने की है।
पीतल से बनाया मंदिर और राम दरबार
मेले में टीकमगढ़ से आए पारंपरिक धातु शिल्पी रजनीश सोनी पीतल से बना रामदरबार और अयोध्या मंदिर की प्रतिकृति लेकर आए हैं। रजनीश ने बताया कि उन्होंने पीतल से पहली बार रामदरबार बनाया है, जिसमें श्रीराम के साथ माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और बजरंगबली विराजित हैं। यह आकृति वनवास के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन और राजपाट संभालने का दृश्य है। 26 किलो वजनी सबसे बड़े रामदरबार की कीमत 51 हजार रुपए है। रजनीश ने बताया कि हमने अयोध्या के नवनिर्मित राममंदिर की प्रतिकृति भी पीतल से बनाई है। इन आकृतियों को विवाह, गृह प्रवेश आदि के मौके पर उपहार के रूप में देने के लिए पसंद किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि धातु से शिल्पकारी हमारी पारंपरिक कला है। 1910 में मेरे दादाजी ने यह कार्य आरंभ किया था।
अयोध्या तक पहुंचा धनुष- बाण
धनुर्धर के रूप में भी भगवान राम की पहचान है। पुराने समय में धनुष का उपयोग युद्ध लड़ने और शिकार करने के लिए किया जाता था, लेकिन वर्तमान समय में धनुष- बाण कम ही देखने को मिलते हैं। शिल्प मेले में बांसवाड़ा (राजस्थान) के काष्ठ शिल्पी हितेश तिरगर धनुष- बाण लेकर आए हैं। यहां वे आगंतुकों से निशाना लगवा रहे हैं और धुनष- बाण का विक्रय भी कर रहे हैं। हितेश ने बताया कि अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के दौरान भगवान राम से जुड़ी वस्तुएं मंगाई गई थीं, तब उन्होंने मंदिर ट्रस्ट को अपने हाथ से बनाया धनुष- बाण भेंट किया था, जिसे प्राण प्रतिष्ठा के दौरान मंदिर के गर्भ गृह में रखा गया था। उन्होंने बताया कि झाउ और बांस की लकड़ी का उपयोग कर धनुष बनाया जाता है। पहले सिंपल धनुष बनता था अब फोल्डिंग वाला बनाया जाने लगा है। एक धनुष की कीमत 11 सौ से दो हजार तक है। अब ज्यादातर खेल में इनका उपयोग होता है।











